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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

पंचमशतक ५. ( १४१ )
करी विरह ऐसी तऊ, गैल न छांडत नीच।
दीन्हेहू चश्माचखन, चाहै लखै न मीच॥४२४॥
यद्यपि वियोगने ऐसा 'दुर्बल' कररक्खाहै तथापि नीच
मार्ग नहीं छोड़ती मृत्यु आँखोंमें चश्मा लगाकर भी ढूंढती
है परन्तु उसे नहीं पाती इससे बची है ऐसी दुबली होगई
है। अत्युक्ति ॥ ४२४ ॥
नित संशो हंसो बचत, मनो सुइह अनुमान।
विरह अगिन लपटिनसकै, झपटनमीच सिचान॥
हे सखी! यह सदा 'संशो' संदेहही रहता है कि, इसका
(हंसो) जीव कैसे बचेगा, परन्तु यह अनुमान है कि, विरहकी
अग्निकी लपटोंसे बाजरूपी मृत्यु इसको झपट नहीं सकती
हेतूत्प्रेक्षा ॥ ४२५ ॥
पलन प्रगट बरुनीन बढ़ि, छन कपोल ठहरात।
अँसुआपरछतियांछिनक, छनछनायछिपछात॥
हे सखी ! पलकोंमें प्रगटहो बरौनियों में बढ़कर क्षणमा-
त्रको कपोलपर ठहरते हैं, फिर उसके आंसु छातीपर पड़ते
ही छिनमात्रमें छनछना कर छिप जाते हैं। अत्युक्ति॥४२६॥
प्रगट्यो आग वियोगकी, बह्यो विलोचन नीर।
आठों याम रहे हियो, उठ्यो उमंगसमीर॥४२७॥