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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 193

( १४० ) सतसई-सटीक ।
तजि शंका सकुचत न चित, बोलत बाक कुबाक।
दिनक्षणदा छाकीरहति, छुटति नक्षणछबिछाक॥
प्रोषितपतिका क प्रलाप उन्माद वर्णन, सखी उसने शंका
त्याग दी है चित्तमें सकुचाती नहीं वाक्य कुवाक्य बोलती है
दिन रात मत्त रहती है क्षणको प्रीतमके रूपका मद नहीं
छुटता [ दोहा-दोमें हो इक अधिकई, व्यतिरेकालंकार ।
मदछक पुनि छबि छकरही, छुटत न प्राण अधार ] । व्यति-
रेकालंकार ॥ ४२१ ॥
करके मीडे कुसुमलों, गई विरह कुम्हिलाय ।
सदासमीपिनसखिनहूं, नीठ पिछानी जाय ४२२
प्रोषितपतिकाको सखीका वचन, तुम्हारी प्यारी हाथके
मसले फूलके समान कुम्हिला गई है सदा समीपमें रहने-
वाली सखियोंसेभी तो नहीं पहँचानी जाती। लुप्तालंकार ४२२
नेक न जानी परत यों, परो विरहू तनु छाम ।
उठति दियालों बाढ़िहरि, लियो तिहारेनाम४२३
वह इस समय नेक भी नहीं जानी पडती इस प्रकार
विरहसे उसका शरीर क्षीण पडगया है परन्तु हेकृष्ण! तुम्हा-
रा नाम लेनेसे अब भी दीवेके समान डहडहा उठती है। उप-
मेयलुप्ता है ॥ ४२३ ॥