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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 192

पंचमशतक ५. ( १३९ )
धीर धारण नहीं करती रातदिन जलीसी रहती है उसको
गाढ़ी पीर बढ़ीहै । वृत्यनुप्रास ॥ ४१७ ॥
इत आवत चलिजात उत, चली छ सातिक हाथ।
चढ़ी हिंडोरेसीरहै, लगी उसासनि साथ ॥४१८॥
इधर आवैहै, उधर चलीजायहै, फिर छः सातक हाथ
चलती है उसासोंके साथ लगी हिंडोरे पर चढ़ीसी रहती है
आशय यह कि, सांस छोडनेसे बढ़ै है और लेनेसे हटैहै।
उपमेयलुप्ता ॥ ४१८ ॥
फिरि फिरि बूझति कहि कहा, कहो साँवरे गात ।
कहा करत देखे कहां, अली चली क्यों बात४१९
प्रेमके मारे सखीसे वारंवार बूझती है कह तो साँवरे शरी-
रने क्या कहाहै, कृष्ण तुमने क्या करते हुए कहां देखे, और
उनके समीप मेरी चर्चा कैसे चली। प्रेमालंकार ॥ ४१९ ॥
जोन्ह नहीं यह तम यहै, किये जु जगत निकेत ।
होतउदयशशिकं भयो, मानहु शशिडरिसित४२०
हे सखी ! यह चांदनी नहीं वही अंधकार है जिसने जगत
में अपने घर कियेथे चन्द्रमाके उदय होतेही मानों सहमकर
धोला होगया है । उत्प्रेक्षा- चांदनी सुखदाई होती है यह
दुःखदहै प्रोषितपतिका० ॥४२०॥