बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमशतक ५. (१४३)
गनती गनवेते रही, छतहू अछत समान ।
अब अलिये तिथि औमलो, परे रहैं तनुप्रान४३१
जिस प्रकारसे अवम् तिथि गिन्तीके गिननेमें नहीं आती
है और वह ( छत ) होकरभी अनहोनेके समान है, हे
आली ! अब यह औम् हानि तिथिके समान शरीरमें प्राण
पडे रहेंगे काममें नहीं आवेंगे । पूर्णोपमा ॥ ४३१ ॥
विरहविपति दिन परतही, तजे सुखनि सब अंग ।
रहि अवलम्ब दुखी भये, चला चली जियसंग ॥
हे सखी ! विरहकी विपत्तिके दिन पडतेही सुखोंने सब
अंगोंको त्याग दिया, अबलों दुःखोंका अवलम्ब था परन्तु
अब जीके साथ वेभी जाते हैं । लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ४३२ ॥
मरुन भलो वरु विरहते, यह विचार चित जोय ।
मरत मिटै दुख एकको, विरह दुहुँन दुख होय ४३३
हे सखि ! वियोगसे मरना भला है, यह विचार तू अपने
मनमें कर देख, कारण कि, मरनेमें एकका दुःख छूट जाता
है, और विरहमें दोनोंको दुःख होता है । लेशालंकार [दोहा-
दोषनमें गुण कल्पना, गुणमें दोष बनाय ॥ सो लेशालंकार
है कविजन लखन सुभाय ] ॥ ४३३ ॥