बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४२ ) सतसई-सटीक ।
वियोगकी आगसे प्रगट हुआ जल उसके नेत्रों से बहता
है आठों पहर उसका मन इवासकी पवनसे उड़ा रहता है ।
पर्यायोक्ति ॥ ४२७ ॥
तजो आँच अति विरहकी,रह्यो प्रेमरस भीज ।
नयननिके मग जल बहै,हियो पसीज पसीज ४२८
हे सखी ! अब इसका शरीर विरहकी आंचसे तचा है और
प्रेमके रसमें भीजकर हृदयसे पसीज २ कर नेत्रोंके मार्ग से
जल बहता है । समासोक्ति ॥ ४२८ ॥
चकी जकीसी है रही, बूझे बोलति नीठि ।
कहूं दीठलोनी लगी, कै काहूकी दीठि ॥४२९॥
जड़ता वर्णन, वह भौंचक जकड़ीसी होरही है, बूझेसे
भी नहीं बोलती, नीठकर कहीं इसकी दृष्टि लगी है, अथवा
किसीकी दृष्टि इसे लगी है। सन्देहालंकार ॥ ४२९ ॥
मरी डरी कि टरी व्यथा,कहा खरी चलि चाहि !
रहीकराहि कराहि अति,अबमुख आहि नआहि ॥
मरी पड़ी है अथवा उसकी व्यथा दूर हुई, तू क्या खड़ी
ह चलकर देख तौ कराह कराह रही थी अब बहुत इसके
मुखमें हाय नहीं है मरणदशा । वृत्यनुप्रासकी भांति वीप्सा
और यमक ॥ ४३० ॥