बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
चतुर्थशतक ४. (१२७)
परन्तु यह जो किसी अन्य प्रियाका छल्ला अपने हाथकी कन
उँगलीके छोरमें पहर आये हो इसे दूर करो नहीं तो प्रिया
इसको देखेगी तुम्हारा होता तो उँगलीमें भर आता। विष-
मालङ्कार ॥ ३७९ ॥
सीरे जतननि शिशिरऋतु, सहि विरहिन तनु ताप।
बसनेको ग्रीषमदिनन, परो परोसिन पाप॥३८०॥
प्रोषितपतिकाकी दशा वर्णन, हे कृष्ण ! अगहन पूसके
दिनोंमें शीतल उपचारोंसे वियोगिनीके शरीर की अग्नि सहन
करली अब ग्रीष्म ज्येष्ठ आपाढके दिनोंमें परोसियोंको नि-
वास करनेको दुःख पड़ा है। अयुक्तालंकार, शिशिरऋतु
पूस माह ॥ ३८० ॥
आडे दै आले वसन, जाडेहूकी रात ।
साहस कैकै नेहवश, सखी सब ढिग जात॥३८१॥
जाडेकी भी रातमें बीचमें गीले कपडेकी आडकर प्रेमके
मारे बडा साहस करके सब सखी, उसके निकट जाती हैं
अर्थात् उसके तनुकी विरहाग्निसे जलीजाती हैं । अयुक्त्य-
लंकार ॥ ३८१ ॥
औंधाई सीसी सुलखि, विरहबरी विल्लात ।
बीचै सूख गुलाब गो, छींटो छुई न गात ॥३८२॥
( १२८ ) सतसई-सटीक ।
हे प्रीतम! एक सखीने जो उलट कर सीसी उसके शिरपर
डाली अर्थात् विरहसे विकल हो विद्धाते हुए सीसी लुढकाली
बीचमेंही गुलाब सूखगया उसके शरीरमें छींट भी न लगी ।
अयुक्तालंकार ॥ ३८२ ॥
जेहि निदाघ दोपहर रहै, भई माघकी रात ।
तेहि उशीरकी रावटी, खरी आवटी जात ३८३॥
जेठकी दुपहरी जिस खसकें बंगलेमें माघकी रात हुईरहै
उस खसके बंगलेमें वियोग अग्निके मारे वह अत्यन्त औटा
जाता है, एक विरह और दूसरी खसकी रावटी यह दोनों
उद्दीपन हैं । विभावना छेकानुप्रास ॥ ३८३ ॥
विकसित नववल्लीकुसुम, निकसत परिमल पाय ।
परसिय जारति विरह हिय, बरसिरहेकी बाय ३८४
यद्यपि खिलते हुए नई बेलके फूलोंको परसकर सुगंधित
हो निकलती है, और बरसेके पीछेकी शीतल पवनभी है
तथापि स्पर्श करते ही विरही जनोंके हृदयको जलाती है
बरसनेसे शीतल पुष्पोंमें लगनेसे सुगंध और बेलोंके पत्तोंमें
रुककर आनेसे मन्द है । हेतु अलंकार ॥ ३८४ ॥
विरहबरी लख जोगनन, कह्यो सो उहि कैबार ॥
अरी आव भज भीतरे, बरसत आज अँगार ३८५
चतुर्थशतक ४. ( १२९ )
विरहज्वरीने पटबीजनोंको देखकर कँवार यह बात सखी
से कही अरी आउ, भजिया आज अँगारे भीतरही बरसते हैं।
भ्रान्ति अलंकार ॥ ३८५ ॥
धुरवा होय न अलि उठे, धुआँ धरनि चहुँ कांद ।
जारत आवत जगतको, पावस प्रथम पयोद ३८६
हे सखी ! यह बादल नहीं है पृथ्वीके चारों ओर धुआँ
उठरहा है यह श्रावणका पहला मेघ जगतको जलाता आता
है । अपह्नुति ॥ ३८६॥
पावक झरतैं मेहझर, दाहक दुसह विशेषि ।
दहै देह वाके परश, याहि दृगनकी देखि ॥ ३८७॥
हे सखी ! अग्निकी झरसे मेघकी झर विशेषकर दुःखद
जलानेवाली है; उसके छूनेसे देह जलना है इसके तो नेत्रोंके
देखनेही जलता है। व्यतिरेक यमक ॥ ३८७ ॥
मार सुमार करी खरी, अरी मरीहि न मारि ।
सींचि गुलाब घरी घरी, अरी बरीहि न वारि ३८८
एक तो कामने तीक्ष्ण मार करके इसे अति व्याकुल
किया है दूसरे तू घड़ी घड़ी गुलाब छिड़ककर बलतीहुई
को मत बालि 'मरीहि न मारि' इस प्रकार मरी हुई को मत
मारि। वृत्यनुप्रास यमक ॥ ३८८ ॥
( १३० ) सतसई-सटीक ।
अरे परे न करै हियो, खरे जरेपर जार ।
लावत घोरि गुलाबसो, मलय मिलै घनसार ३८९
अरे इसे परे क्यों नहीं करता, अति जले हुए हृदयको
क्यों जलाता है जो गुलाबसे मिला चन्दन और कपूर घोल
कर लाता है आशय यह कि, एक तो मैं विरहसे जलूंहूं दूसरे
यह उद्दीपन पदार्थ औरभी दुःख देते हैं। विषमालंकार ३८९
कौन सुनै कासों कहौं, सुरत बिसारी नाह ।
बदा बदी जिय लेत है, ए बदरा बदराह ॥३९०॥
मेरा दुःख कौन सुनै मैं किससे कहूं प्रीतमने सुरत बिसार
दीहै, होड़ा होड़ी करके यह कुचाली बादल मेरा जी लेते हैं;
कारण यह कि, कुपथगामी निर्दयी होते हैं, यह निर्दयीही
मेरा जी लेते हैं । जमकालंकार ॥ ३९० ॥
फिर सुधि दै सुधि द्याइये, यह निरदई निरास
नई नई बहुरौं दई, दई उसास उसास ॥ ३९१ ।
फिर सुधि देकर इस निर्दयी निराशने प्रीतमकी या
दिलाई फिर इसने नई नई सांस उकासदीहैं। वीप्सा जमक
अलंकार ॥ ३९१ ॥
बन बाटन पिक बटपरा, तकि विरहिन मत मैन ।
कुहो कुहो कहि कहि उठत, करि करि राते नैन॥
चतुर्थशतक ४. ( १३१ )
कामदेवकी ओरका पिकरूपी बटमार वनके मार्ग में
विरहियोंको देखकर लाल आँख करके कुहो कुहो कह
उठता है । रूपकालंकार ॥ ३९२ ॥
दुसहविरह दारुणदशा, रही न और उपाय ।
जात जात जिय राखिये,पियकी बात सुनाय ३९३
दुसह विरहकी दारुण दशामें अब और उपाय नहीं रहा
प्रीतमकी बात सुनाकर जाते जाते जियको राखिये । पर्या-
योक्ति ॥ ३९३ ॥
कहे जु वचन वियोगिनी,विरहविकल अकुलाय।
कियेनको अँसुआंसहित, सोवत बोल सुनाय ॥
उस वियोगिनीने जो विरहसे व्याकुलहो चिल्लाकर वचन
कहे हैं उनको सोनेको जातेमें सुनाकर किसको आंसूंसहित
नहीं किया अर्थात् उसके शयन समय उसके दुःखकी कथा-
को सुनकर सब रोने लगते हैं ॥ ३९४ ॥
सोरठा-मैं लखि नारीज्ञान,करराख्यो निर्धार यह
वहई रोगनिदान, वहै वैद्य औषधि वहै ॥३९५॥
मैंने उसकी नाड़ी देखकर ज्ञानसे यह निश्चय कररखा है
वही इसके रोगका निदान ( आदि कारण ) वही वैद्य और
वही औषधि है अर्थात् वह मिलै तो रोग जाय। हेतु॥३९५॥
( १३२ ) सतसई-सटीक ।
विरहसुखाई देह, नेह कियो अति डहडहो ।
जैसे बरसे मेह, जरै जवासा जर जमै ॥३९६॥
वियोगने देह सुखारक्खी है प्रीतिने डहाडहा कररक्खाहै
जिस प्रकार मेघ बरसनेसे जवासा सूखताहै परन्तु उसकी जड़
डहडही होतीहै । दृष्टान्त ॥ ३९६ ॥
दो०-कहाभयो जो बीछुरे,मों मन तो मन साथ।
उडीजात कितहू गुडी,तऊ उडायक हाथ ३९७॥
क्या हुआ जो इस समय हम बिछड़तेहैं मेरा मन तो तुम्हारे
साथहै कनकैया किधरकोही उड़ै परन्तु उड़ानेवालेकेही
हाथमें रहतीहै । दृष्टान्तालंकार ॥ ३९७ ॥
विरहविथा जल परसबिन,बसियत मो जियताल।
कछु जानत जलथमनविधि, दुर्योधनलों लाल ॥
विरहकी विथाके जलको स्पर्श किये बिना मेरे जीरूपी
सरोवरमें आप निवास करते हो हेलाल ! क्या आप दुर्योधन
के समान कुछ जलथंभनविधि जानतेहो जिससे मेरे मन-
रूपी सरोवरकी विरहविथा तुमको नहीं व्यापती । पूर्णो-
पमा ॥ ३९८ ॥
सोरठा।
पावसकठिन जु पीर, अबला क्योंकर सहिसकै।
तऊ धरत न धीर,रक्तबीजसम अवतरै ॥३९९॥
चतुर्थशतक ४. (१३३)
वर्षाऋतुकी कठिन पीड़ाको अबला किसप्रकार सहन
करसकती है इसमें तो उनकाभी धीर नहीं रहता जिनका रक्त
और बीज समान ( नपुंसक ) है स्त्रीका रज थोड़ा
पुरुषका वीर्य अधिक होनेसे पुरुषवीर्य न्यूनहोनेसे कन्या
समान होनेसे नपुंसक होताहै। दृष्टान्त ॥ ३९९ ॥
बिजुरा जनु मेह, आन यहां विरहा घरे ।
आठों यामअछेह, दृग जु बरत बरसत रहत४००
बिजलीके साथमें मेघ लाकर मानों विरहने यहाँ रख
दियाहै जो निरन्तर आठों पहर नेत्र बलते और बरसते रहते
हैं। वस्तूत्प्रेक्षालंकार ॥४००॥
इति श्रीकविवर बिहारीलालकी सतसईमें भाषाटीकासहित
चतुर्थ शतक पूर्ण हुआ ॥४॥
सोरठा ।
कौडा आंसुबूंद, करि सांकर बरुनी सजत ।
कीने वदनहि मूंद, दृग मलंग डोर रहत॥४०१॥
आंसुओंकी बूंद बड़ी कौड़ी किये जलमदिन बरनियोंकी
शृंखलामें कसकर मुख बंदकर नेत्ररूपी नटवाजी डोर पर
रहते अर्थात् लटकतेहैं बड़ी आंखको कौड़ीसी आंख और बड़े
( १३४ ) सतसई-सटीक ।
नेत्रको कौडीसे नेत्र कहतेहैं । साँकर-जंजीर । मलंग-फकीर
योगी ॥ ४०१ ॥
दोहा ।
कागदपर लिखत न बनत, कहत संदेश लजात ।
कहिहै सब तेरो हियो, मेरे हियकी बात ॥४०२॥
प्रोषितपतिकाका संदेशा सखीसे, हेसखी! काग़जपर लिखते
नहीं बनता और संदेशा कहतेमें लाज आतीहै तेरा हृदयही
सब मेरे मनकी बात कहदेगा अपने मनके दुःखसे मेरा दुःख
जानना! परिसंख्यालंकार ॥ ४०२ ॥
तर झुरसी ऊपर गरी, काजलजल छिरकाय ।
पिय पाती बिनहीं लिखी, बाँची विरहनलाय ४०३
जिससमय विरहाग्निसे भरी प्रोषितपतिका स्वामीको पत्री
लिखने बैठी तो उसके हाथकी अग्निसे तरेसे झुरसी और
रुदन करनेसे आंखोंके काजलसहित आंसू गिरनेसे ऊपरसे
गरी निदान प्यारीकी विनाही लिखी पत्रीमें पतिने उसका
विरहदुःख बांचलिया । अनुमान अलंकार ॥ ४०३ ॥
विरहविकल बिनही लिखी, पाती दई पठाय ।
अंकबिहूनी यों सुचित, सूने बांचतुजाय॥४०४॥
विरहकी व्याकुलताके कारण प्यारीने विनालिखीही
पत्री भेजदी वह अक्षरसे रहितहै तथापि चित्त देकर प्रीतम
पंचमशतक ५. ( १३५ )
सूनेही बांचते जायँहें आशय यह कि, पत्री पातेही प्यारीकी
सब विपत् मनमें समागई । भ्रान्ति ॥ ४०४ ॥
करले चूम चढ़ाय शिर, उर लगाय भुजभेंट ।
लहिपाती पियकी लखति, बाँचति धरति समेट ४०५
प्यारेकी पत्री हाथमें ले मुखसे चूम शिर चढ़ाय हृदयसे
लगाय भुजासे मिलाती देखती बांचकर समेट धरतीहै । प्रेमा-
लंकार ॥ ४०५ ॥
रँगराती राते हिये, प्रीतम लिखी बनाय ।
पाती काती विरहकी, छाती रही लगाय ॥ ४०६ ॥
प्रीतमने लालरंगके कागजपर अनुरागभरे मनसे पाती
बनाकर लिखी उस विरहकी काटनेवालीको प्यारी हृदयसे
लगाय रही अथवा काती=विरहके तारसे फैलीहुई। वृत्त्यनु-
प्रास ॥ ४०६ ॥
नाच अचानकही उठो, बिन पावस वनमोर ।
जानतिहौं नन्दित करी, यह दिशि नन्दकिशोर ॥
अचानकही बिना वर्षाऋतुके वनमें मोर नाचउठे विदित
होताहै कि, इस दिशाको घनश्यामने अपने आगमनसे प्रसन्न
किया आशय यह कि, राधिकाकी उद्वेगदशा जानकर सखी
( १३६ ) सतसई-सटीक ।
उपायकरतीथीं कि, इसमें किसीने बिन पावस मोर नाचते देख
अनुमानसे कृष्णका आगम जताया । अनुमान ॥ ४०७ ॥
कोटि यतन कोऊ करो, तनुकी तपति न जाय ।
जौंलागि भीजै चीरलौं, रहै न यों लपटाय ॥४०८॥
प्यारी कोटि यतन करो परन्तु प्यारेके तनुकी तपन
नहीं जायगी जबतक भीजे चीरके समान तुम्हारे शरीरमें
लिपटकर न रहै । पूर्णोपमा--नायक उपमा चीर उपमेय
लौं वाचक लिपटना धर्म ॥ ४०८ ॥
सोवत सपने श्यामघन, हिलामिल हरत वियोग ।
तबही टरि कितहूँगई, नींदौ नींद न जोग ॥४०९॥
सखी सोतेसमय स्वप्नमें श्यामघन हिलमिलकर वियोग
हरते थे उसी समय टलकर कहीं नींद चलीगई इससे यह
निंदाके योग्यहै, 'नींद तोहि बेचूं गाहक होय' । विपरीता-
लंकार-[दोहा--सिधिको बाधक होय जहँ, साधनसों वि-
परीत। नींद योग साधक यहां, बाधक भई अनीत] ॥४०९॥
जब जब वे सुधि कीजिये, तब तब सब सुधि जाहिं।
आँखिन आँख लगीरहै, आँखै लागत नाहिं ४१०
सखी जब जब उन बातोंकी याद करीजायहै, तब तब दुःखके
पंचमशतक ५. ( १३७ )
कारण सब सुधबुध जातीरहै है उनकी आंखोंमें मेरी आंख
लगी रहतीहैं, रातको आंख नहीं लगती ॥ ४१० ॥
सघनकुञ्जछाया सुखद, शीतल मन्द समीर ।
मन ह्वैजात अजौं वही, वा यमुनाके तीर॥४११॥
हे सखी ! सघन कुञ्जकी छाया सुखदायक शीतल मन्द
पवनवाले उस यमुनाके किनारे जानेसे कृष्णकी वह सब वार्त्ता
स्मरण करनेसे अबभी मन वैसाही होजाताहै ॥ ४११ ॥
जहाँ जहाँ ठाढ्यो लख्यो, श्याम सुभग शिरमोर।
उनहूँबिनक्षणगहिरहत, दृगनिअजौंवहठौर ४१२
भाग्यवानोंके मुकुटमणि कृष्णको पहल जहाँ जहाँ खड़े
हुए देखा था अब उनके विनाभी नेत्र उस स्थानको देखकर
क्षणमात्रको वहां स्थित होजातेहैं वा वह स्थान अब भी
क्षणमात्रके लिये नेत्रोंको पकड़रखताहै । स्मृति ॥ ४१२ ॥
सोवत जागत सपनवश, रस रिस चैन कुचैन ।
सुरति श्यामघनकी सुरति, बिसरैहू बिसरै न ४१३
सोते जागते स्वप्नमें रसमें रिसमें चैनमें कुचैनमें श्या-
मघनकी सुरत हृदयमें रहतीहै विसारनेभी नहीं विसरती ।
विशेषोक्ति ॥ ४१३ ॥
( १३८ ) सतसई-सटीक ।
भ्रुकुटी मटकन पीतपट, चटक लटकती चाल ।
चलचखचितवनि चोरि चित, लियो विहारीलाल॥
हे सखि ! भौंहोंके मटकाने, पीतवस्त्रकी चटक, लटकती
चाल तथा चंचल आंखोंकी चितवनसे कृष्णने मेरा मन
चुरालिया । जाति अलंकार ॥ ४१४ ॥
औरै भाँति भये बये, चौसर चंदन चंद ।
पतिबिन अतिपारति विपति, मारत मारुत मंद ॥
हे सखी! अब चार लडका मोतियोंके फूलोंका हार चंदन
और चन्द्रमा अब औरही भांतिके होगये यह पतिके विना
महाविपत्ति डालते हैं और मंद पवन तो मारे डालती है ।
भेदाकातिशयोक्ति ॥ ४१५ ॥
हौँही बौरी विरहवश, कै बोरो सब गाम ।
कहाजानिये कहतहैं, शशिहि शीतकरनाम ४१६
हे सखी ! क्या विरहके वंशसे मैं बौरीगईहूं, कै सब गांव बा-
वरोहै क्या जानकर चन्द्रमाका नाम शीतल किरण कहते हैं.
यह तो शीतकर नहीं है । संदेहालंकार ॥ ४१६ ॥
ह्यांते हां ह्यांते यहां, नैको धरत न धीर ।
निशिदिन ठाढीसीरहै, बाढी गाढी पीर ॥४१७॥
हे सखी ! वह ह्यांसे हां और हांसे यहां आतीहै, तनकभी
पंचमशतक ५. ( १३९ )
धीर धारण नहीं करती रातदिन जलीसी रहती है उसको
गाढ़ी पीर बढ़ीहै । वृत्यनुप्रास ॥ ४१७ ॥
इत आवत चलिजात उत, चली छ सातिक हाथ।
चढ़ी हिंडोरेसीरहै, लगी उसासनि साथ ॥४१८॥
इधर आवैहै, उधर चलीजायहै, फिर छः सातक हाथ
चलती है उसासोंके साथ लगी हिंडोरे पर चढ़ीसी रहती है
आशय यह कि, सांस छोडनेसे बढ़ै है और लेनेसे हटैहै।
उपमेयलुप्ता ॥ ४१८ ॥
फिरि फिरि बूझति कहि कहा, कहो साँवरे गात ।
कहा करत देखे कहां, अली चली क्यों बात४१९
प्रेमके मारे सखीसे वारंवार बूझती है कह तो साँवरे शरी-
रने क्या कहाहै, कृष्ण तुमने क्या करते हुए कहां देखे, और
उनके समीप मेरी चर्चा कैसे चली। प्रेमालंकार ॥ ४१९ ॥
जोन्ह नहीं यह तम यहै, किये जु जगत निकेत ।
होतउदयशशिकं भयो, मानहु शशिडरिसित४२०
हे सखी ! यह चांदनी नहीं वही अंधकार है जिसने जगत
में अपने घर कियेथे चन्द्रमाके उदय होतेही मानों सहमकर
धोला होगया है । उत्प्रेक्षा- चांदनी सुखदाई होती है यह
दुःखदहै प्रोषितपतिका० ॥४२०॥
( १४० ) सतसई-सटीक ।
तजि शंका सकुचत न चित, बोलत बाक कुबाक।
दिनक्षणदा छाकीरहति, छुटति नक्षणछबिछाक॥
प्रोषितपतिका क प्रलाप उन्माद वर्णन, सखी उसने शंका
त्याग दी है चित्तमें सकुचाती नहीं वाक्य कुवाक्य बोलती है
दिन रात मत्त रहती है क्षणको प्रीतमके रूपका मद नहीं
छुटता [ दोहा-दोमें हो इक अधिकई, व्यतिरेकालंकार ।
मदछक पुनि छबि छकरही, छुटत न प्राण अधार ] । व्यति-
रेकालंकार ॥ ४२१ ॥
करके मीडे कुसुमलों, गई विरह कुम्हिलाय ।
सदासमीपिनसखिनहूं, नीठ पिछानी जाय ४२२
प्रोषितपतिकाको सखीका वचन, तुम्हारी प्यारी हाथके
मसले फूलके समान कुम्हिला गई है सदा समीपमें रहने-
वाली सखियोंसेभी तो नहीं पहँचानी जाती। लुप्तालंकार ४२२
नेक न जानी परत यों, परो विरहू तनु छाम ।
उठति दियालों बाढ़िहरि, लियो तिहारेनाम४२३
वह इस समय नेक भी नहीं जानी पडती इस प्रकार
विरहसे उसका शरीर क्षीण पडगया है परन्तु हेकृष्ण! तुम्हा-
रा नाम लेनेसे अब भी दीवेके समान डहडहा उठती है। उप-
मेयलुप्ता है ॥ ४२३ ॥
पंचमशतक ५. ( १४१ )
करी विरह ऐसी तऊ, गैल न छांडत नीच।
दीन्हेहू चश्माचखन, चाहै लखै न मीच॥४२४॥
यद्यपि वियोगने ऐसा 'दुर्बल' कररक्खाहै तथापि नीच
मार्ग नहीं छोड़ती मृत्यु आँखोंमें चश्मा लगाकर भी ढूंढती
है परन्तु उसे नहीं पाती इससे बची है ऐसी दुबली होगई
है। अत्युक्ति ॥ ४२४ ॥
नित संशो हंसो बचत, मनो सुइह अनुमान।
विरह अगिन लपटिनसकै, झपटनमीच सिचान॥
हे सखी! यह सदा 'संशो' संदेहही रहता है कि, इसका
(हंसो) जीव कैसे बचेगा, परन्तु यह अनुमान है कि, विरहकी
अग्निकी लपटोंसे बाजरूपी मृत्यु इसको झपट नहीं सकती
हेतूत्प्रेक्षा ॥ ४२५ ॥
पलन प्रगट बरुनीन बढ़ि, छन कपोल ठहरात।
अँसुआपरछतियांछिनक, छनछनायछिपछात॥
हे सखी ! पलकोंमें प्रगटहो बरौनियों में बढ़कर क्षणमा-
त्रको कपोलपर ठहरते हैं, फिर उसके आंसु छातीपर पड़ते
ही छिनमात्रमें छनछना कर छिप जाते हैं। अत्युक्ति॥४२६॥
प्रगट्यो आग वियोगकी, बह्यो विलोचन नीर।
आठों याम रहे हियो, उठ्यो उमंगसमीर॥४२७॥
( १४२ ) सतसई-सटीक ।
वियोगकी आगसे प्रगट हुआ जल उसके नेत्रों से बहता
है आठों पहर उसका मन इवासकी पवनसे उड़ा रहता है ।
पर्यायोक्ति ॥ ४२७ ॥
तजो आँच अति विरहकी,रह्यो प्रेमरस भीज ।
नयननिके मग जल बहै,हियो पसीज पसीज ४२८
हे सखी ! अब इसका शरीर विरहकी आंचसे तचा है और
प्रेमके रसमें भीजकर हृदयसे पसीज २ कर नेत्रोंके मार्ग से
जल बहता है । समासोक्ति ॥ ४२८ ॥
चकी जकीसी है रही, बूझे बोलति नीठि ।
कहूं दीठलोनी लगी, कै काहूकी दीठि ॥४२९॥
जड़ता वर्णन, वह भौंचक जकड़ीसी होरही है, बूझेसे
भी नहीं बोलती, नीठकर कहीं इसकी दृष्टि लगी है, अथवा
किसीकी दृष्टि इसे लगी है। सन्देहालंकार ॥ ४२९ ॥
मरी डरी कि टरी व्यथा,कहा खरी चलि चाहि !
रहीकराहि कराहि अति,अबमुख आहि नआहि ॥
मरी पड़ी है अथवा उसकी व्यथा दूर हुई, तू क्या खड़ी
ह चलकर देख तौ कराह कराह रही थी अब बहुत इसके
मुखमें हाय नहीं है मरणदशा । वृत्यनुप्रासकी भांति वीप्सा
और यमक ॥ ४३० ॥
पंचमशतक ५. (१४३)
गनती गनवेते रही, छतहू अछत समान ।
अब अलिये तिथि औमलो, परे रहैं तनुप्रान४३१
जिस प्रकारसे अवम् तिथि गिन्तीके गिननेमें नहीं आती
है और वह ( छत ) होकरभी अनहोनेके समान है, हे
आली ! अब यह औम् हानि तिथिके समान शरीरमें प्राण
पडे रहेंगे काममें नहीं आवेंगे । पूर्णोपमा ॥ ४३१ ॥
विरहविपति दिन परतही, तजे सुखनि सब अंग ।
रहि अवलम्ब दुखी भये, चला चली जियसंग ॥
हे सखी ! विरहकी विपत्तिके दिन पडतेही सुखोंने सब
अंगोंको त्याग दिया, अबलों दुःखोंका अवलम्ब था परन्तु
अब जीके साथ वेभी जाते हैं । लुप्तोत्प्रेक्षा ॥ ४३२ ॥
मरुन भलो वरु विरहते, यह विचार चित जोय ।
मरत मिटै दुख एकको, विरह दुहुँन दुख होय ४३३
हे सखि ! वियोगसे मरना भला है, यह विचार तू अपने
मनमें कर देख, कारण कि, मरनेमें एकका दुःख छूट जाता
है, और विरहमें दोनोंको दुःख होता है । लेशालंकार [दोहा-
दोषनमें गुण कल्पना, गुणमें दोष बनाय ॥ सो लेशालंकार
है कविजन लखन सुभाय ] ॥ ४३३ ॥
( १४४ ) सतसई-सटीक ।
मरवेको साहस कियो, बढे विरहकी पीर ।
दौरति है समुहे शशिहि, सरसिज सुरभिसमीर ॥
विरहकी पीर बढजानेसे वियोगिनीने मरनेका साहस
किया है, चन्द्रमा कमल सुगन्धित पवन इनके सन्मुख दौ-
रती है तात्पर्य यह कि, वियोगीको उपरोक्त वस्तु ताप देती
है सो वह इनके समीप धावमान होती है कि, अधिक अग्निसे
शरीर भस्म होजाय, यहाँ चन्द्रमादि उद्दीपन विभाव हैं,
विचित्रांलंकार [ दोहा-जहँ निज इच्छा किये ते फल विपरीत
लखाय । तेहि विचित्र भूषण कहत, कविजन हिय
हुलसाय ] ॥ ४३४ ॥
सुनतपथिकमुहँमाहानिशि, लुएँचलत उहिगाम ।
बिन बूझे बिनहू कहे, जियत विचारी वाम॥४३५॥
पथिकके मुखसे यह बात सुनकर कि, माहकी रातमें
उस गाममें लुएँ चलती हैं, बिना बूझे बिनाही कहे प्रोषित
पतिका बालाके नायकने विचारलिया कि, प्यारी अबतक
जीतीहै चलें । अनुमान ॥ ४३५ ॥
मानों मनुहारी भरी, मान्यो खरी मिठाहिं ।
वाको अति अनखाहटो, मुसकाहट बिन नाहिं ॥
धृष्टनायककथन, सखी मारभी उसकी प्यारसे भरी ह
पंचमशतक ५. ( १४५ )
और गारीभी अति मीठी लगती हैं, उसका अधिक अनखाना
भी मुसकुराहटके बिना नहीं है। विरोधक्रिया बिन विरोधा-
लंकारवर्णन ॥ ४३६ ॥
लहि रतिसुख लगिये गरे, लखी लजीली डीठि
खुलत न मो मनगडिरही, वहैअधखुलीनीठि ४३७
नायकवचन, हेसखि ! जिस समय वह रतिका सुख लेकर
गलेसे लगी, और लाजभरी दृष्टिसे देखा, सो वह उसकी अ-
धखुली दृष्टि छुटती नहीं, मेरे मनमें गडरहीहै। विरोधाभास !
[ दो०-जो विरोधवत भासियत, अरु विरुद्ध नहिं होयकहत
विरोधाभास तेहि, कविजन जानत कोय] ॥ ४३७॥
बडी कुटुमकी भीरमें, रही पैठ दे पीठि।
तऊ पलक परिजात इत, हेरि हँसौही डीठि ४३८
कुटुम्बके लोगोंकी बड़ी भीरमें यद्यपि वह पीठ देकर बैठ
गई है तथापि स्वभावसे हँसीली दृष्टिसे इधर पलक पड़जातीहै
और देखतीहै । तृतीय विभावना ॥ ४३८ ॥
सरसत पोंछति लखिरहत, लागि कपोलकें ध्यान ।
करिलेप्यो पाटल विमल, प्यारी पठये पान४३९
कहीं प्यारीके भेजे पान प्यारेके पास आये उन्हें देखकर
कपोलोंका ध्यान आगया, इसपर सखी कहनेलगी दूतीहें
( १४६ ) सतसई-सटीक ।
पोंछते हैं देखते रहजातेहैं प्यारीके गालोंके ध्यानमें लगेहुए
गुलाबसे निर्मल हाथमें प्यारीके भेजे पान लेकर सरसते हैं
पाटल-कुछ सफेदी और लाली लिये गुलाब । सरसतका अर्थ
चिकनानेका है ॥ ४३९ ॥
नखशिखवर्णन ।
सहज सुचिक्कन स्याम रुचि,शुचिसुगंधसुकुमार।
गनत न मनपथअपथलखि,बिथुरेसुथरेबार ४४०.
स्वभावसे चिकने, कारे कान्तिमान्, पवित्र, सुगंधित और
कोमल बिखरे सुन्दर बार उसके देखकर मेरा मन पथ अपथ
भला बुरा नहीं विचारता । जाति अलंकार [दोहा-निजजाति
नके कर्म गुण, जामें मिलहिं प्रवीन ॥ ताहि जातिभूषण
कहत, यह मत अतिप्राचीन ] ॥ ४४० ॥
छुटे छुटावैं जगतसे, सटकारे सुकुमार ।
मन बाँधत वेणी बँधे, नीलछबीरे बार ॥ ४४१ ॥
प्यारीके बाल छुटे ( खुले ) हुए जगत्से छुटादेतेहैं, इस
प्रकार सटकारे( लम्बे पतले ) और कोमल हैं और वेणी बाँ-
धनेसे मनको बांधते हैं इस प्रकार नीले छबिभरे बारहैं । चतुर्थ
विभावना ॥ ४४१ ॥
कुटिलअलकछुटिपरतमुख,बढिगोइतो उदोत ।
बँक बँकारी देत ज्यों, दाम रुपैया होत ॥४४२॥