बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचमशतक ५. ( १३५ )
सूनेही बांचते जायँहें आशय यह कि, पत्री पातेही प्यारीकी
सब विपत् मनमें समागई । भ्रान्ति ॥ ४०४ ॥
करले चूम चढ़ाय शिर, उर लगाय भुजभेंट ।
लहिपाती पियकी लखति, बाँचति धरति समेट ४०५
प्यारेकी पत्री हाथमें ले मुखसे चूम शिर चढ़ाय हृदयसे
लगाय भुजासे मिलाती देखती बांचकर समेट धरतीहै । प्रेमा-
लंकार ॥ ४०५ ॥
रँगराती राते हिये, प्रीतम लिखी बनाय ।
पाती काती विरहकी, छाती रही लगाय ॥ ४०६ ॥
प्रीतमने लालरंगके कागजपर अनुरागभरे मनसे पाती
बनाकर लिखी उस विरहकी काटनेवालीको प्यारी हृदयसे
लगाय रही अथवा काती=विरहके तारसे फैलीहुई। वृत्त्यनु-
प्रास ॥ ४०६ ॥
नाच अचानकही उठो, बिन पावस वनमोर ।
जानतिहौं नन्दित करी, यह दिशि नन्दकिशोर ॥
अचानकही बिना वर्षाऋतुके वनमें मोर नाचउठे विदित
होताहै कि, इस दिशाको घनश्यामने अपने आगमनसे प्रसन्न
किया आशय यह कि, राधिकाकी उद्वेगदशा जानकर सखी