बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३६ ) सतसई-सटीक ।
उपायकरतीथीं कि, इसमें किसीने बिन पावस मोर नाचते देख
अनुमानसे कृष्णका आगम जताया । अनुमान ॥ ४०७ ॥
कोटि यतन कोऊ करो, तनुकी तपति न जाय ।
जौंलागि भीजै चीरलौं, रहै न यों लपटाय ॥४०८॥
प्यारी कोटि यतन करो परन्तु प्यारेके तनुकी तपन
नहीं जायगी जबतक भीजे चीरके समान तुम्हारे शरीरमें
लिपटकर न रहै । पूर्णोपमा--नायक उपमा चीर उपमेय
लौं वाचक लिपटना धर्म ॥ ४०८ ॥
सोवत सपने श्यामघन, हिलामिल हरत वियोग ।
तबही टरि कितहूँगई, नींदौ नींद न जोग ॥४०९॥
सखी सोतेसमय स्वप्नमें श्यामघन हिलमिलकर वियोग
हरते थे उसी समय टलकर कहीं नींद चलीगई इससे यह
निंदाके योग्यहै, 'नींद तोहि बेचूं गाहक होय' । विपरीता-
लंकार-[दोहा--सिधिको बाधक होय जहँ, साधनसों वि-
परीत। नींद योग साधक यहां, बाधक भई अनीत] ॥४०९॥
जब जब वे सुधि कीजिये, तब तब सब सुधि जाहिं।
आँखिन आँख लगीरहै, आँखै लागत नाहिं ४१०
सखी जब जब उन बातोंकी याद करीजायहै, तब तब दुःखके