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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

चतुर्थशतक ४. ( १२९ )
विरहज्वरीने पटबीजनोंको देखकर कँवार यह बात सखी
से कही अरी आउ, भजिया आज अँगारे भीतरही बरसते हैं।
भ्रान्ति अलंकार ॥ ३८५ ॥
धुरवा होय न अलि उठे, धुआँ धरनि चहुँ कांद ।
जारत आवत जगतको, पावस प्रथम पयोद ३८६
हे सखी ! यह बादल नहीं है पृथ्वीके चारों ओर धुआँ
उठरहा है यह श्रावणका पहला मेघ जगतको जलाता आता
है । अपह्नुति ॥ ३८६॥
पावक झरतैं मेहझर, दाहक दुसह विशेषि ।
दहै देह वाके परश, याहि दृगनकी देखि ॥ ३८७॥
हे सखी ! अग्निकी झरसे मेघकी झर विशेषकर दुःखद
जलानेवाली है; उसके छूनेसे देह जलना है इसके तो नेत्रोंके
देखनेही जलता है। व्यतिरेक यमक ॥ ३८७ ॥
मार सुमार करी खरी, अरी मरीहि न मारि ।
सींचि गुलाब घरी घरी, अरी बरीहि न वारि ३८८
एक तो कामने तीक्ष्ण मार करके इसे अति व्याकुल
किया है दूसरे तू घड़ी घड़ी गुलाब छिड़ककर बलतीहुई
को मत बालि 'मरीहि न मारि' इस प्रकार मरी हुई को मत
मारि। वृत्यनुप्रास यमक ॥ ३८८ ॥