बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थशतक ४. (१२७)
परन्तु यह जो किसी अन्य प्रियाका छल्ला अपने हाथकी कन
उँगलीके छोरमें पहर आये हो इसे दूर करो नहीं तो प्रिया
इसको देखेगी तुम्हारा होता तो उँगलीमें भर आता। विष-
मालङ्कार ॥ ३७९ ॥
सीरे जतननि शिशिरऋतु, सहि विरहिन तनु ताप।
बसनेको ग्रीषमदिनन, परो परोसिन पाप॥३८०॥
प्रोषितपतिकाकी दशा वर्णन, हे कृष्ण ! अगहन पूसके
दिनोंमें शीतल उपचारोंसे वियोगिनीके शरीर की अग्नि सहन
करली अब ग्रीष्म ज्येष्ठ आपाढके दिनोंमें परोसियोंको नि-
वास करनेको दुःख पड़ा है। अयुक्तालंकार, शिशिरऋतु
पूस माह ॥ ३८० ॥
आडे दै आले वसन, जाडेहूकी रात ।
साहस कैकै नेहवश, सखी सब ढिग जात॥३८१॥
जाडेकी भी रातमें बीचमें गीले कपडेकी आडकर प्रेमके
मारे बडा साहस करके सब सखी, उसके निकट जाती हैं
अर्थात् उसके तनुकी विरहाग्निसे जलीजाती हैं । अयुक्त्य-
लंकार ॥ ३८१ ॥
औंधाई सीसी सुलखि, विरहबरी विल्लात ।
बीचै सूख गुलाब गो, छींटो छुई न गात ॥३८२॥