बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३४ ) सतसई-सटीक ।
नेत्रको कौडीसे नेत्र कहतेहैं । साँकर-जंजीर । मलंग-फकीर
योगी ॥ ४०१ ॥
दोहा ।
कागदपर लिखत न बनत, कहत संदेश लजात ।
कहिहै सब तेरो हियो, मेरे हियकी बात ॥४०२॥
प्रोषितपतिकाका संदेशा सखीसे, हेसखी! काग़जपर लिखते
नहीं बनता और संदेशा कहतेमें लाज आतीहै तेरा हृदयही
सब मेरे मनकी बात कहदेगा अपने मनके दुःखसे मेरा दुःख
जानना! परिसंख्यालंकार ॥ ४०२ ॥
तर झुरसी ऊपर गरी, काजलजल छिरकाय ।
पिय पाती बिनहीं लिखी, बाँची विरहनलाय ४०३
जिससमय विरहाग्निसे भरी प्रोषितपतिका स्वामीको पत्री
लिखने बैठी तो उसके हाथकी अग्निसे तरेसे झुरसी और
रुदन करनेसे आंखोंके काजलसहित आंसू गिरनेसे ऊपरसे
गरी निदान प्यारीकी विनाही लिखी पत्रीमें पतिने उसका
विरहदुःख बांचलिया । अनुमान अलंकार ॥ ४०३ ॥
विरहविकल बिनही लिखी, पाती दई पठाय ।
अंकबिहूनी यों सुचित, सूने बांचतुजाय॥४०४॥
विरहकी व्याकुलताके कारण प्यारीने विनालिखीही
पत्री भेजदी वह अक्षरसे रहितहै तथापि चित्त देकर प्रीतम