बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमशतक ५. ( १३७ )
कारण सब सुधबुध जातीरहै है उनकी आंखोंमें मेरी आंख
लगी रहतीहैं, रातको आंख नहीं लगती ॥ ४१० ॥
सघनकुञ्जछाया सुखद, शीतल मन्द समीर ।
मन ह्वैजात अजौं वही, वा यमुनाके तीर॥४११॥
हे सखी ! सघन कुञ्जकी छाया सुखदायक शीतल मन्द
पवनवाले उस यमुनाके किनारे जानेसे कृष्णकी वह सब वार्त्ता
स्मरण करनेसे अबभी मन वैसाही होजाताहै ॥ ४११ ॥
जहाँ जहाँ ठाढ्यो लख्यो, श्याम सुभग शिरमोर।
उनहूँबिनक्षणगहिरहत, दृगनिअजौंवहठौर ४१२
भाग्यवानोंके मुकुटमणि कृष्णको पहल जहाँ जहाँ खड़े
हुए देखा था अब उनके विनाभी नेत्र उस स्थानको देखकर
क्षणमात्रको वहां स्थित होजातेहैं वा वह स्थान अब भी
क्षणमात्रके लिये नेत्रोंको पकड़रखताहै । स्मृति ॥ ४१२ ॥
सोवत जागत सपनवश, रस रिस चैन कुचैन ।
सुरति श्यामघनकी सुरति, बिसरैहू बिसरै न ४१३
सोते जागते स्वप्नमें रसमें रिसमें चैनमें कुचैनमें श्या-
मघनकी सुरत हृदयमें रहतीहै विसारनेभी नहीं विसरती ।
विशेषोक्ति ॥ ४१३ ॥