बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३२ ) सतसई-सटीक ।
विरहसुखाई देह, नेह कियो अति डहडहो ।
जैसे बरसे मेह, जरै जवासा जर जमै ॥३९६॥
वियोगने देह सुखारक्खी है प्रीतिने डहाडहा कररक्खाहै
जिस प्रकार मेघ बरसनेसे जवासा सूखताहै परन्तु उसकी जड़
डहडही होतीहै । दृष्टान्त ॥ ३९६ ॥
दो०-कहाभयो जो बीछुरे,मों मन तो मन साथ।
उडीजात कितहू गुडी,तऊ उडायक हाथ ३९७॥
क्या हुआ जो इस समय हम बिछड़तेहैं मेरा मन तो तुम्हारे
साथहै कनकैया किधरकोही उड़ै परन्तु उड़ानेवालेकेही
हाथमें रहतीहै । दृष्टान्तालंकार ॥ ३९७ ॥
विरहविथा जल परसबिन,बसियत मो जियताल।
कछु जानत जलथमनविधि, दुर्योधनलों लाल ॥
विरहकी विथाके जलको स्पर्श किये बिना मेरे जीरूपी
सरोवरमें आप निवास करते हो हेलाल ! क्या आप दुर्योधन
के समान कुछ जलथंभनविधि जानतेहो जिससे मेरे मन-
रूपी सरोवरकी विरहविथा तुमको नहीं व्यापती । पूर्णो-
पमा ॥ ३९८ ॥
सोरठा।
पावसकठिन जु पीर, अबला क्योंकर सहिसकै।
तऊ धरत न धीर,रक्तबीजसम अवतरै ॥३९९॥