बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थशतक ४. ( १३१ )
कामदेवकी ओरका पिकरूपी बटमार वनके मार्ग में
विरहियोंको देखकर लाल आँख करके कुहो कुहो कह
उठता है । रूपकालंकार ॥ ३९२ ॥
दुसहविरह दारुणदशा, रही न और उपाय ।
जात जात जिय राखिये,पियकी बात सुनाय ३९३
दुसह विरहकी दारुण दशामें अब और उपाय नहीं रहा
प्रीतमकी बात सुनाकर जाते जाते जियको राखिये । पर्या-
योक्ति ॥ ३९३ ॥
कहे जु वचन वियोगिनी,विरहविकल अकुलाय।
कियेनको अँसुआंसहित, सोवत बोल सुनाय ॥
उस वियोगिनीने जो विरहसे व्याकुलहो चिल्लाकर वचन
कहे हैं उनको सोनेको जातेमें सुनाकर किसको आंसूंसहित
नहीं किया अर्थात् उसके शयन समय उसके दुःखकी कथा-
को सुनकर सब रोने लगते हैं ॥ ३९४ ॥
सोरठा-मैं लखि नारीज्ञान,करराख्यो निर्धार यह
वहई रोगनिदान, वहै वैद्य औषधि वहै ॥३९५॥
मैंने उसकी नाड़ी देखकर ज्ञानसे यह निश्चय कररखा है
वही इसके रोगका निदान ( आदि कारण ) वही वैद्य और
वही औषधि है अर्थात् वह मिलै तो रोग जाय। हेतु॥३९५॥