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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 181

( १२८ ) सतसई-सटीक ।
हे प्रीतम! एक सखीने जो उलट कर सीसी उसके शिरपर
डाली अर्थात् विरहसे विकल हो विद्धाते हुए सीसी लुढकाली
बीचमेंही गुलाब सूखगया उसके शरीरमें छींट भी न लगी ।
अयुक्तालंकार ॥ ३८२ ॥
जेहि निदाघ दोपहर रहै, भई माघकी रात ।
तेहि उशीरकी रावटी, खरी आवटी जात ३८३॥
जेठकी दुपहरी जिस खसकें बंगलेमें माघकी रात हुईरहै
उस खसके बंगलेमें वियोग अग्निके मारे वह अत्यन्त औटा
जाता है, एक विरह और दूसरी खसकी रावटी यह दोनों
उद्दीपन हैं । विभावना छेकानुप्रास ॥ ३८३ ॥
विकसित नववल्लीकुसुम, निकसत परिमल पाय ।
परसिय जारति विरह हिय, बरसिरहेकी बाय ३८४
यद्यपि खिलते हुए नई बेलके फूलोंको परसकर सुगंधित
हो निकलती है, और बरसेके पीछेकी शीतल पवनभी है
तथापि स्पर्श करते ही विरही जनोंके हृदयको जलाती है
बरसनेसे शीतल पुष्पोंमें लगनेसे सुगंध और बेलोंके पत्तोंमें
रुककर आनेसे मन्द है । हेतु अलंकार ॥ ३८४ ॥
विरहबरी लख जोगनन, कह्यो सो उहि कैबार ॥
अरी आव भज भीतरे, बरसत आज अँगार ३८५