सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186

चतुर्थशतक ४. (१३३)
वर्षाऋतुकी कठिन पीड़ाको अबला किसप्रकार सहन
करसकती है इसमें तो उनकाभी धीर नहीं रहता जिनका रक्त
और बीज समान ( नपुंसक ) है स्त्रीका रज थोड़ा
पुरुषका वीर्य अधिक होनेसे पुरुषवीर्य न्यूनहोनेसे कन्या
समान होनेसे नपुंसक होताहै। दृष्टान्त ॥ ३९९ ॥
बिजुरा जनु मेह, आन यहां विरहा घरे ।
आठों यामअछेह, दृग जु बरत बरसत रहत४००
बिजलीके साथमें मेघ लाकर मानों विरहने यहाँ रख
दियाहै जो निरन्तर आठों पहर नेत्र बलते और बरसते रहते
हैं। वस्तूत्प्रेक्षालंकार ॥४००॥
इति श्रीकविवर बिहारीलालकी सतसईमें भाषाटीकासहित
चतुर्थ शतक पूर्ण हुआ ॥४॥
सोरठा ।
कौडा आंसुबूंद, करि सांकर बरुनी सजत ।
कीने वदनहि मूंद, दृग मलंग डोर रहत॥४०१॥
आंसुओंकी बूंद बड़ी कौड़ी किये जलमदिन बरनियोंकी
शृंखलामें कसकर मुख बंदकर नेत्ररूपी नटवाजी डोर पर
रहते अर्थात् लटकतेहैं बड़ी आंखको कौड़ीसी आंख और बड़े