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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

( १३० ) सतसई-सटीक ।
अरे परे न करै हियो, खरे जरेपर जार ।
लावत घोरि गुलाबसो, मलय मिलै घनसार ३८९
अरे इसे परे क्यों नहीं करता, अति जले हुए हृदयको
क्यों जलाता है जो गुलाबसे मिला चन्दन और कपूर घोल
कर लाता है आशय यह कि, एक तो मैं विरहसे जलूंहूं दूसरे
यह उद्दीपन पदार्थ औरभी दुःख देते हैं। विषमालंकार ३८९
कौन सुनै कासों कहौं, सुरत बिसारी नाह ।
बदा बदी जिय लेत है, ए बदरा बदराह ॥३९०॥
मेरा दुःख कौन सुनै मैं किससे कहूं प्रीतमने सुरत बिसार
दीहै, होड़ा होड़ी करके यह कुचाली बादल मेरा जी लेते हैं;
कारण यह कि, कुपथगामी निर्दयी होते हैं, यह निर्दयीही
मेरा जी लेते हैं । जमकालंकार ॥ ३९० ॥
फिर सुधि दै सुधि द्याइये, यह निरदई निरास
नई नई बहुरौं दई, दई उसास उसास ॥ ३९१ ।
फिर सुधि देकर इस निर्दयी निराशने प्रीतमकी या
दिलाई फिर इसने नई नई सांस उकासदीहैं। वीप्सा जमक
अलंकार ॥ ३९१ ॥
बन बाटन पिक बटपरा, तकि विरहिन मत मैन ।
कुहो कुहो कहि कहि उठत, करि करि राते नैन॥