सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

( १२० ) सतसई-सटीक ।
हो हाथ पसीजते हैं इससे तुम उठजाओ तो महँदी सूखे ।
हेतु विकृति० ॥ ३५७ ॥
चितवनि रूखे दृगनिकी, हाँसी बिन मुसिकान ।
मान जनायो माननी, मानलियो पियजान ३५८
सूखे नेत्रोंकी चितवन और बिनमुसकानकी हांसीसेही
प्रीतमको माननीने मान बताया, और चतुर प्रीतमने जान-
लिया। लाटानुप्रास ॥ ३५८ ॥
पति ऋतु अवगुण गुणबढत, मान माँहको शीत।
जात कठिनहै अतिमृदौ,रमणीमननवनीत ३५९
पतिके अवगुणसे मान और ऋतुके गुणसे माहका शीत
बढता है रमणीका मन और मक्खन अति कोमलहैं तथापि
कठिन हो जाता है। दृष्टान्तरूपक ॥ ३५९ ॥
वाही निशितें ना मिटो, मान कलहको मूल ।
भले पधारे पाहुने, है गुडहरको फूल ॥ ३६० ॥
उसी रातसे क्लेशका मूल मान नहीं मिटा गुडहरके फूल
के समान हाकर पाहुने भले पधारे हैं आशय यह कि, रात-
को कहीं और रहकर सबेरेको रतिचिह्नसे युक्त माथेपर
महावर पलकों में पीकादि लगाकर प्रीतमआये इस कारण

चतुर्थशतक ४. ( १२१ )
गुडहरका फूल कहा है कि, जहां यह रहता है वहां क्लेश
रहता है। वाचकलुप्ता लोकोक्ति ॥ ३६० ॥
खरे अदब अठिलाहटी, उर उपजावत त्रास ॥
दुसहशंक विषकी करै, जैसे सोंठमिठास ॥ ३६१ ॥
प्यारीका सभ्यतासे इठलानाभी मेरे मनमें दुःख उपजाता
है जैसे सोंठका मिठास विषकी दुःसह शंका उत्पन्न करताहै
सोंठका मिठास विषयुक्त जानना। दृष्टान्त ॥ ३६१ ॥
दोऊ अधिकाई भरे, एक गो गहराय ॥
कौन मनावै को मनै, मानै मति ठहराय ॥ ३६२ ॥
दोनों पियप्यारे गर्वभरे एकही गाँकी बात करते हैं कौन
मनावै कौन मनै जब इनकी मति ठहरावेगी तब आपही मनेंगे
प्रणयके कलहको मान कहते हैं। काव्यलिंग ॥ ३६२ ॥
हाँसि हँसाय उर लाय उठि, कहिन रुखाहैं वैन।
जकित थकितसे ह्वैरहे, तकत तिरीछे नैन ॥ ३६३ ॥
हँसकर हँसाकर उसे हृदयसे लगाय उठ रूखे बचन
मत कहे इत जकड़े और थकेसे होकर मेरे तिरछे नेत्रोंको
प्रीतम देखते हैं। वृत्त्यनुप्रास ॥ ३६३ ॥
मान करत बरजत नहीं, उलट दिवावत माँह।
करै रिसौहीं जायगी, सहजहँसाहीं भौंह ॥ ३६४ ॥

( १२२ ) सतसई-सटीक ।
मान करतेमें बरजती नहीं और उलटी सौंह दिवाती है
क्या तुम यह स्वभावसे हँसौही भौंहें रिसभरी करेही जाओगी
मान दृढ करनेको सखीने यह वचन कहे । काकोक्ति छे-
कानुप्रास ॥ ३६४ ॥
जो चाहत चटक न घटै, मैलो होय न मित्त ।
रज राजस न छुवाइये, नेह चीकने चित्त ॥ ३६५॥
हे मित्र ! जो तुम चाहो कि, प्रेमकी चमक न घटै और मित्र
का मन अप्रसन्न न हो तो नेहसे चिकने हुए चित्तमें रजोगुणकी
धूरि मतछुवाओ आशय यह कि प्रीतमपर आज्ञाबल मतचला
ओ श्लेषालंकार ॥ ३६५ ॥
सोंहैंहूं चाह्यो नतैं, किती दिवाइ सौंह ॥
एहो क्यों बैठी किये, ऐंठी ग्वैंठी भौंह ॥ ३६६॥
तैने मानसे प्रीतमके सन्मुखभी न देखा, मैंने कितनी सौ-
गंधभी दिवाई, फिर अब क्यों टेढी गठीली भौंहकिये बैठी है।
वृत्यनुप्रास ॥ ३६६ ॥
खरी पातरी कानकी, कौन बहाऊवानि ॥
आककलीन रलीकरे, अली अली जियजानि ३६७
हे सखी ! तू कानकी बहुत हलकी है जो कोई बात कहै
उसे तू मान जाय है इस तेरी बान स्वभावमें बहाऊँ हे आली

चतुर्थशतक ४. ( १२३ )
तू अपने मनमें विचार करले कि, भौंरा आककी कलीसे
विहार नहीं करता है नायकको अन्यसे रति करनेवाला जान
प्यारीने मान किया इसपर सखीने समझाया । छेकानुप्रास
जमक ॥ ३६७ ॥
तो रस राच्यो आन वश, कहै कुटिल मति क्रूर॥
जीभ निबौरी क्यों लहै, बौरी चाख अँगूर ३६८॥
वह तो तेरे रसमेंही रँगरहे हैं उन्हें औरके वश किसी खोटे
मतिवाले क्रूरने कहा है यह सत्य मत जाने, हे बावरी ! जिसने
अंगूर खाये हैं इसकी जीभमें निबोली क्यों भावेगी । न्यासा-
लंकार ॥ ३६८ ॥
गहिरी गरब न कीजिये, समय सुहागहि पाय ॥
जीकी जीवन जेठलों, माह छांह सुहाय ३६९
हे मानिनी ! समय समय सुहाग पाकर बहुत मान मत
करो जेठ महीनेकी जीकी जीवनछाया माहमें अच्छी नहीं
लगती गहरी-वा गहली-मानिनी । दृष्टान्तालंकार ॥ ३६९॥
बहकि बड़ाई आपनी, कत राचत मतिभूल ।
बिनमधु मधुकरके हिये, गड़े न गुड़हरफूल ३७०
बहककर अपनी बड़ाईसे हे मतिभूल ! क्यों प्रसन्न होती
है तू सुन्दरी है परन्तु उसके विना भौंरेके हृदयमें गुड़-

( १२४ ) सतसई-सटीक ।
हरका फूल नहीं भाता ‘अथवा यह मतिकी भूल है जो
अपनी बड़ाईसे प्रसन्न होय है माननीके निकट सौत प्रसन्न
हो आकर बैठी थी उसपर सखीने कहा’ अथवा मूर्खोंमें अपनी
बड़ाईसे प्रसन्न होनेपर । अन्योक्ति ॥ ३७० ॥
अनियारे दीरघनयन, किती न तरुणिसमान ।
वह चितवनि औरेकछू, जिहिंवशहोतसुजान ३७१
नोकीले और दीर्घनेत्रोंकी कितनी एक स्त्री; समान होती
है परन्तु जिसके वश चतुर होते हैं वह चितवन कुछ औरही
है । भेदकातिशयोक्ति ॥ ३७१ ॥
हाहा वदन उघार दृग, सफल करै सब कोय ।
रोज सरोजनके परै, हँसी शशीकी होय॥३७२॥
रात्रिके समय दूतीने प्यारीसे कहा, हा कष्ट! अथवा हाहा
खाऊं तनक मुख तो उघार सबही कोई अपने नेत्र सफल करें
तेरे मुख उघाडनेसे कमलोंको शोक होगा और चन्द्रमाकी हँसी
होगी आशय यह है कि, तेरे मुखचंद्रसे कलंकित चंद्र हास्य
को प्राप्त होगा कमल कुँभिलायेंगे तेरा मान छूटनेसे मुख
उघडेगा तो यह सब वार्ता होंगी ॥ ३७२ ॥
कहालेहुगे खेलमें, तजौ अटपटी बात ।
नेक हँसौहीं है भई, भौंहैं सौहें खात ॥ ३७३ ॥

चतुर्थशतक ४. (१२५)
खेलमें क्या लोगे अपनी अटपटी बात छोडो मेरे शपथ
करते करते प्यारीकी भौंहें कुछ हँसौहीं हुई हैं आशय यह
कि, प्रीतम मनाने आये तो दूसरीकाही नाम निकल गया
इससे फिर प्यारी रूठी इसपर सखीने हँसीमें डालकर
कृष्णसे कहा ये चिढानेकी बातें छोडदो। हेतु ॥ ३७३ ॥
चलो चले छुटिजायगो, हठि रावरो सँकोच।
खरे बढाये होत अब, आये लोचन लोच ॥ ३७४॥
हे प्रीतम ! चलो तो आपके चलनेसे सब हठ छुटजायगी
तुम्हारे संकोचसे जो अति चढायेथे वे नेत्र अब नरमीपर आये
हैं अर्थात् इस समय कुछ क्रोध न्यून हुआ है चलनेका समय
है शीघ्र चलो ॥ ३७४ ॥
अनरसहूँ रस पाइये, रसिक रसीली पास ।
जैसे साँठेकी कठिन, गाँठें भरी मिठास ॥३७५॥
हे प्रीतमरसिक ! उस रसीलीके पास चलनेसे अनरसमें
भी रस पाओगे जैसे गन्नेकी गांठ कठिन है परन्तु मिठासमें भरी
है आशय यह कि, उसका मानभी देख प्रसन्न होगे। दृष्टान्ता-
लंकार ॥ ३७५ ॥
क्यौंहूँ मंत्र बात न लगे, थाके भेद उपाय ॥
हठ दृढ गढबैठी सुकवि, लीजे सुरंग लगाय॥ ३७६

( १२६ ) सतसई-सटीक ।
किसी प्रकारकी हमारी बलकी बात नहीं लगती, हम
भेद और उपायसे हारगईं, वह दृढ हठ किला ग्रहण कर बैठ-
गई है उसे सुरँग लगाय कर लीजे। भेद-साम दाम दण्ड भेद
यह चार हैं ॥ ३७६ ॥
सकत न तब ताते वचन, मो रसको रस खोय ।
क्षण क्षण औटे क्षीरलौं, खरो सवादल होय ३७७॥
शठ नायकका वचन अधीरा माननी नायकासे, तेरे तत्ते
वचन मेरे अनुरागके स्वादको नहीं दूर करसकते मेरा प्रेम
क्षण क्षणमें औटे दूधके समान अति स्वादिष्ट होता है अर्थात्
मानिनी उसको दुर्वचन कहती है और वह उसको सुन प्रसन्न
होताहै। उपमालंकार ॥ ३७७ ॥
सकुचि न रहिये श्याम सुनि, यह सतरोहे वैन ।
देत रचैाहे चित कहैं,नेह नचौहे नैन ॥ ३७८ ॥
हे श्याम ! यह सतरोहे क्रोधके वचन सुनकर संकोचित
होकर न रहिये, प्रेमसे रंगे नेत्रही कहेदेते हैं कि, चित्त प्रेमसे
रच रहा है ॥ ३७८ ॥
आये आप भली करी, मेटन मान मरोर ।
दूर करो यह देखि है,छला छिगुनियां छोर ३७९॥
आप मानकी मरोर मेटने को आये यह बहुत अच्छी करी

चतुर्थशतक ४. (१२७)
परन्तु यह जो किसी अन्य प्रियाका छल्ला अपने हाथकी कन
उँगलीके छोरमें पहर आये हो इसे दूर करो नहीं तो प्रिया
इसको देखेगी तुम्हारा होता तो उँगलीमें भर आता। विष-
मालङ्कार ॥ ३७९ ॥
सीरे जतननि शिशिरऋतु, सहि विरहिन तनु ताप।
बसनेको ग्रीषमदिनन, परो परोसिन पाप॥३८०॥
प्रोषितपतिकाकी दशा वर्णन, हे कृष्ण ! अगहन पूसके
दिनोंमें शीतल उपचारोंसे वियोगिनीके शरीर की अग्नि सहन
करली अब ग्रीष्म ज्येष्ठ आपाढके दिनोंमें परोसियोंको नि-
वास करनेको दुःख पड़ा है। अयुक्तालंकार, शिशिरऋतु
पूस माह ॥ ३८० ॥
आडे दै आले वसन, जाडेहूकी रात ।
साहस कैकै नेहवश, सखी सब ढिग जात॥३८१॥
जाडेकी भी रातमें बीचमें गीले कपडेकी आडकर प्रेमके
मारे बडा साहस करके सब सखी, उसके निकट जाती हैं
अर्थात् उसके तनुकी विरहाग्निसे जलीजाती हैं । अयुक्त्य-
लंकार ॥ ३८१ ॥
औंधाई सीसी सुलखि, विरहबरी विल्लात ।
बीचै सूख गुलाब गो, छींटो छुई न गात ॥३८२॥

( १२८ ) सतसई-सटीक ।
हे प्रीतम! एक सखीने जो उलट कर सीसी उसके शिरपर
डाली अर्थात् विरहसे विकल हो विद्धाते हुए सीसी लुढकाली
बीचमेंही गुलाब सूखगया उसके शरीरमें छींट भी न लगी ।
अयुक्तालंकार ॥ ३८२ ॥
जेहि निदाघ दोपहर रहै, भई माघकी रात ।
तेहि उशीरकी रावटी, खरी आवटी जात ३८३॥
जेठकी दुपहरी जिस खसकें बंगलेमें माघकी रात हुईरहै
उस खसके बंगलेमें वियोग अग्निके मारे वह अत्यन्त औटा
जाता है, एक विरह और दूसरी खसकी रावटी यह दोनों
उद्दीपन हैं । विभावना छेकानुप्रास ॥ ३८३ ॥
विकसित नववल्लीकुसुम, निकसत परिमल पाय ।
परसिय जारति विरह हिय, बरसिरहेकी बाय ३८४
यद्यपि खिलते हुए नई बेलके फूलोंको परसकर सुगंधित
हो निकलती है, और बरसेके पीछेकी शीतल पवनभी है
तथापि स्पर्श करते ही विरही जनोंके हृदयको जलाती है
बरसनेसे शीतल पुष्पोंमें लगनेसे सुगंध और बेलोंके पत्तोंमें
रुककर आनेसे मन्द है । हेतु अलंकार ॥ ३८४ ॥
विरहबरी लख जोगनन, कह्यो सो उहि कैबार ॥
अरी आव भज भीतरे, बरसत आज अँगार ३८५

चतुर्थशतक ४. ( १२९ )
विरहज्वरीने पटबीजनोंको देखकर कँवार यह बात सखी
से कही अरी आउ, भजिया आज अँगारे भीतरही बरसते हैं।
भ्रान्ति अलंकार ॥ ३८५ ॥
धुरवा होय न अलि उठे, धुआँ धरनि चहुँ कांद ।
जारत आवत जगतको, पावस प्रथम पयोद ३८६
हे सखी ! यह बादल नहीं है पृथ्वीके चारों ओर धुआँ
उठरहा है यह श्रावणका पहला मेघ जगतको जलाता आता
है । अपह्नुति ॥ ३८६॥
पावक झरतैं मेहझर, दाहक दुसह विशेषि ।
दहै देह वाके परश, याहि दृगनकी देखि ॥ ३८७॥
हे सखी ! अग्निकी झरसे मेघकी झर विशेषकर दुःखद
जलानेवाली है; उसके छूनेसे देह जलना है इसके तो नेत्रोंके
देखनेही जलता है। व्यतिरेक यमक ॥ ३८७ ॥
मार सुमार करी खरी, अरी मरीहि न मारि ।
सींचि गुलाब घरी घरी, अरी बरीहि न वारि ३८८
एक तो कामने तीक्ष्ण मार करके इसे अति व्याकुल
किया है दूसरे तू घड़ी घड़ी गुलाब छिड़ककर बलतीहुई
को मत बालि 'मरीहि न मारि' इस प्रकार मरी हुई को मत
मारि। वृत्यनुप्रास यमक ॥ ३८८ ॥

( १३० ) सतसई-सटीक ।
अरे परे न करै हियो, खरे जरेपर जार ।
लावत घोरि गुलाबसो, मलय मिलै घनसार ३८९
अरे इसे परे क्यों नहीं करता, अति जले हुए हृदयको
क्यों जलाता है जो गुलाबसे मिला चन्दन और कपूर घोल
कर लाता है आशय यह कि, एक तो मैं विरहसे जलूंहूं दूसरे
यह उद्दीपन पदार्थ औरभी दुःख देते हैं। विषमालंकार ३८९
कौन सुनै कासों कहौं, सुरत बिसारी नाह ।
बदा बदी जिय लेत है, ए बदरा बदराह ॥३९०॥
मेरा दुःख कौन सुनै मैं किससे कहूं प्रीतमने सुरत बिसार
दीहै, होड़ा होड़ी करके यह कुचाली बादल मेरा जी लेते हैं;
कारण यह कि, कुपथगामी निर्दयी होते हैं, यह निर्दयीही
मेरा जी लेते हैं । जमकालंकार ॥ ३९० ॥
फिर सुधि दै सुधि द्याइये, यह निरदई निरास
नई नई बहुरौं दई, दई उसास उसास ॥ ३९१ ।
फिर सुधि देकर इस निर्दयी निराशने प्रीतमकी या
दिलाई फिर इसने नई नई सांस उकासदीहैं। वीप्सा जमक
अलंकार ॥ ३९१ ॥
बन बाटन पिक बटपरा, तकि विरहिन मत मैन ।
कुहो कुहो कहि कहि उठत, करि करि राते नैन॥

चतुर्थशतक ४. ( १३१ )
कामदेवकी ओरका पिकरूपी बटमार वनके मार्ग में
विरहियोंको देखकर लाल आँख करके कुहो कुहो कह
उठता है । रूपकालंकार ॥ ३९२ ॥
दुसहविरह दारुणदशा, रही न और उपाय ।
जात जात जिय राखिये,पियकी बात सुनाय ३९३
दुसह विरहकी दारुण दशामें अब और उपाय नहीं रहा
प्रीतमकी बात सुनाकर जाते जाते जियको राखिये । पर्या-
योक्ति ॥ ३९३ ॥
कहे जु वचन वियोगिनी,विरहविकल अकुलाय।
कियेनको अँसुआंसहित, सोवत बोल सुनाय ॥
उस वियोगिनीने जो विरहसे व्याकुलहो चिल्लाकर वचन
कहे हैं उनको सोनेको जातेमें सुनाकर किसको आंसूंसहित
नहीं किया अर्थात् उसके शयन समय उसके दुःखकी कथा-
को सुनकर सब रोने लगते हैं ॥ ३९४ ॥
सोरठा-मैं लखि नारीज्ञान,करराख्यो निर्धार यह
वहई रोगनिदान, वहै वैद्य औषधि वहै ॥३९५॥
मैंने उसकी नाड़ी देखकर ज्ञानसे यह निश्चय कररखा है
वही इसके रोगका निदान ( आदि कारण ) वही वैद्य और
वही औषधि है अर्थात् वह मिलै तो रोग जाय। हेतु॥३९५॥

( १३२ ) सतसई-सटीक ।
विरहसुखाई देह, नेह कियो अति डहडहो ।
जैसे बरसे मेह, जरै जवासा जर जमै ॥३९६॥
वियोगने देह सुखारक्खी है प्रीतिने डहाडहा कररक्खाहै
जिस प्रकार मेघ बरसनेसे जवासा सूखताहै परन्तु उसकी जड़
डहडही होतीहै । दृष्टान्त ॥ ३९६ ॥
दो०-कहाभयो जो बीछुरे,मों मन तो मन साथ।
उडीजात कितहू गुडी,तऊ उडायक हाथ ३९७॥
क्या हुआ जो इस समय हम बिछड़तेहैं मेरा मन तो तुम्हारे
साथहै कनकैया किधरकोही उड़ै परन्तु उड़ानेवालेकेही
हाथमें रहतीहै । दृष्टान्तालंकार ॥ ३९७ ॥
विरहविथा जल परसबिन,बसियत मो जियताल।
कछु जानत जलथमनविधि, दुर्योधनलों लाल ॥
विरहकी विथाके जलको स्पर्श किये बिना मेरे जीरूपी
सरोवरमें आप निवास करते हो हेलाल ! क्या आप दुर्योधन
के समान कुछ जलथंभनविधि जानतेहो जिससे मेरे मन-
रूपी सरोवरकी विरहविथा तुमको नहीं व्यापती । पूर्णो-
पमा ॥ ३९८ ॥
सोरठा।
पावसकठिन जु पीर, अबला क्योंकर सहिसकै।
तऊ धरत न धीर,रक्तबीजसम अवतरै ॥३९९॥

चतुर्थशतक ४. (१३३)
वर्षाऋतुकी कठिन पीड़ाको अबला किसप्रकार सहन
करसकती है इसमें तो उनकाभी धीर नहीं रहता जिनका रक्त
और बीज समान ( नपुंसक ) है स्त्रीका रज थोड़ा
पुरुषका वीर्य अधिक होनेसे पुरुषवीर्य न्यूनहोनेसे कन्या
समान होनेसे नपुंसक होताहै। दृष्टान्त ॥ ३९९ ॥
बिजुरा जनु मेह, आन यहां विरहा घरे ।
आठों यामअछेह, दृग जु बरत बरसत रहत४००
बिजलीके साथमें मेघ लाकर मानों विरहने यहाँ रख
दियाहै जो निरन्तर आठों पहर नेत्र बलते और बरसते रहते
हैं। वस्तूत्प्रेक्षालंकार ॥४००॥
इति श्रीकविवर बिहारीलालकी सतसईमें भाषाटीकासहित
चतुर्थ शतक पूर्ण हुआ ॥४॥
सोरठा ।
कौडा आंसुबूंद, करि सांकर बरुनी सजत ।
कीने वदनहि मूंद, दृग मलंग डोर रहत॥४०१॥
आंसुओंकी बूंद बड़ी कौड़ी किये जलमदिन बरनियोंकी
शृंखलामें कसकर मुख बंदकर नेत्ररूपी नटवाजी डोर पर
रहते अर्थात् लटकतेहैं बड़ी आंखको कौड़ीसी आंख और बड़े

( १३४ ) सतसई-सटीक ।
नेत्रको कौडीसे नेत्र कहतेहैं । साँकर-जंजीर । मलंग-फकीर
योगी ॥ ४०१ ॥
दोहा ।
कागदपर लिखत न बनत, कहत संदेश लजात ।
कहिहै सब तेरो हियो, मेरे हियकी बात ॥४०२॥
प्रोषितपतिकाका संदेशा सखीसे, हेसखी! काग़जपर लिखते
नहीं बनता और संदेशा कहतेमें लाज आतीहै तेरा हृदयही
सब मेरे मनकी बात कहदेगा अपने मनके दुःखसे मेरा दुःख
जानना! परिसंख्यालंकार ॥ ४०२ ॥
तर झुरसी ऊपर गरी, काजलजल छिरकाय ।
पिय पाती बिनहीं लिखी, बाँची विरहनलाय ४०३
जिससमय विरहाग्निसे भरी प्रोषितपतिका स्वामीको पत्री
लिखने बैठी तो उसके हाथकी अग्निसे तरेसे झुरसी और
रुदन करनेसे आंखोंके काजलसहित आंसू गिरनेसे ऊपरसे
गरी निदान प्यारीकी विनाही लिखी पत्रीमें पतिने उसका
विरहदुःख बांचलिया । अनुमान अलंकार ॥ ४०३ ॥
विरहविकल बिनही लिखी, पाती दई पठाय ।
अंकबिहूनी यों सुचित, सूने बांचतुजाय॥४०४॥
विरहकी व्याकुलताके कारण प्यारीने विनालिखीही
पत्री भेजदी वह अक्षरसे रहितहै तथापि चित्त देकर प्रीतम

पंचमशतक ५. ( १३५ )
सूनेही बांचते जायँहें आशय यह कि, पत्री पातेही प्यारीकी
सब विपत् मनमें समागई । भ्रान्ति ॥ ४०४ ॥
करले चूम चढ़ाय शिर, उर लगाय भुजभेंट ।
लहिपाती पियकी लखति, बाँचति धरति समेट ४०५
प्यारेकी पत्री हाथमें ले मुखसे चूम शिर चढ़ाय हृदयसे
लगाय भुजासे मिलाती देखती बांचकर समेट धरतीहै । प्रेमा-
लंकार ॥ ४०५ ॥
रँगराती राते हिये, प्रीतम लिखी बनाय ।
पाती काती विरहकी, छाती रही लगाय ॥ ४०६ ॥
प्रीतमने लालरंगके कागजपर अनुरागभरे मनसे पाती
बनाकर लिखी उस विरहकी काटनेवालीको प्यारी हृदयसे
लगाय रही अथवा काती=विरहके तारसे फैलीहुई। वृत्त्यनु-
प्रास ॥ ४०६ ॥
नाच अचानकही उठो, बिन पावस वनमोर ।
जानतिहौं नन्दित करी, यह दिशि नन्दकिशोर ॥
अचानकही बिना वर्षाऋतुके वनमें मोर नाचउठे विदित
होताहै कि, इस दिशाको घनश्यामने अपने आगमनसे प्रसन्न
किया आशय यह कि, राधिकाकी उद्वेगदशा जानकर सखी

( १३६ ) सतसई-सटीक ।
उपायकरतीथीं कि, इसमें किसीने बिन पावस मोर नाचते देख
अनुमानसे कृष्णका आगम जताया । अनुमान ॥ ४०७ ॥
कोटि यतन कोऊ करो, तनुकी तपति न जाय ।
जौंलागि भीजै चीरलौं, रहै न यों लपटाय ॥४०८॥
प्यारी कोटि यतन करो परन्तु प्यारेके तनुकी तपन
नहीं जायगी जबतक भीजे चीरके समान तुम्हारे शरीरमें
लिपटकर न रहै । पूर्णोपमा--नायक उपमा चीर उपमेय
लौं वाचक लिपटना धर्म ॥ ४०८ ॥
सोवत सपने श्यामघन, हिलामिल हरत वियोग ।
तबही टरि कितहूँगई, नींदौ नींद न जोग ॥४०९॥
सखी सोतेसमय स्वप्नमें श्यामघन हिलमिलकर वियोग
हरते थे उसी समय टलकर कहीं नींद चलीगई इससे यह
निंदाके योग्यहै, 'नींद तोहि बेचूं गाहक होय' । विपरीता-
लंकार-[दोहा--सिधिको बाधक होय जहँ, साधनसों वि-
परीत। नींद योग साधक यहां, बाधक भई अनीत] ॥४०९॥
जब जब वे सुधि कीजिये, तब तब सब सुधि जाहिं।
आँखिन आँख लगीरहै, आँखै लागत नाहिं ४१०
सखी जब जब उन बातोंकी याद करीजायहै, तब तब दुःखके

पंचमशतक ५. ( १३७ )
कारण सब सुधबुध जातीरहै है उनकी आंखोंमें मेरी आंख
लगी रहतीहैं, रातको आंख नहीं लगती ॥ ४१० ॥
सघनकुञ्जछाया सुखद, शीतल मन्द समीर ।
मन ह्वैजात अजौं वही, वा यमुनाके तीर॥४११॥
हे सखी ! सघन कुञ्जकी छाया सुखदायक शीतल मन्द
पवनवाले उस यमुनाके किनारे जानेसे कृष्णकी वह सब वार्त्ता
स्मरण करनेसे अबभी मन वैसाही होजाताहै ॥ ४११ ॥
जहाँ जहाँ ठाढ्यो लख्यो, श्याम सुभग शिरमोर।
उनहूँबिनक्षणगहिरहत, दृगनिअजौंवहठौर ४१२
भाग्यवानोंके मुकुटमणि कृष्णको पहल जहाँ जहाँ खड़े
हुए देखा था अब उनके विनाभी नेत्र उस स्थानको देखकर
क्षणमात्रको वहां स्थित होजातेहैं वा वह स्थान अब भी
क्षणमात्रके लिये नेत्रोंको पकड़रखताहै । स्मृति ॥ ४१२ ॥
सोवत जागत सपनवश, रस रिस चैन कुचैन ।
सुरति श्यामघनकी सुरति, बिसरैहू बिसरै न ४१३
सोते जागते स्वप्नमें रसमें रिसमें चैनमें कुचैनमें श्या-
मघनकी सुरत हृदयमें रहतीहै विसारनेभी नहीं विसरती ।
विशेषोक्ति ॥ ४१३ ॥

( १३८ ) सतसई-सटीक ।
भ्रुकुटी मटकन पीतपट, चटक लटकती चाल ।
चलचखचितवनि चोरि चित, लियो विहारीलाल॥
हे सखि ! भौंहोंके मटकाने, पीतवस्त्रकी चटक, लटकती
चाल तथा चंचल आंखोंकी चितवनसे कृष्णने मेरा मन
चुरालिया । जाति अलंकार ॥ ४१४ ॥
औरै भाँति भये बये, चौसर चंदन चंद ।
पतिबिन अतिपारति विपति, मारत मारुत मंद ॥
हे सखी! अब चार लडका मोतियोंके फूलोंका हार चंदन
और चन्द्रमा अब औरही भांतिके होगये यह पतिके विना
महाविपत्ति डालते हैं और मंद पवन तो मारे डालती है ।
भेदाकातिशयोक्ति ॥ ४१५ ॥
हौँही बौरी विरहवश, कै बोरो सब गाम ।
कहाजानिये कहतहैं, शशिहि शीतकरनाम ४१६
हे सखी ! क्या विरहके वंशसे मैं बौरीगईहूं, कै सब गांव बा-
वरोहै क्या जानकर चन्द्रमाका नाम शीतल किरण कहते हैं.
यह तो शीतकर नहीं है । संदेहालंकार ॥ ४१६ ॥
ह्यांते हां ह्यांते यहां, नैको धरत न धीर ।
निशिदिन ठाढीसीरहै, बाढी गाढी पीर ॥४१७॥
हे सखी ! वह ह्यांसे हां और हांसे यहां आतीहै, तनकभी

पंचमशतक ५. ( १३९ )
धीर धारण नहीं करती रातदिन जलीसी रहती है उसको
गाढ़ी पीर बढ़ीहै । वृत्यनुप्रास ॥ ४१७ ॥
इत आवत चलिजात उत, चली छ सातिक हाथ।
चढ़ी हिंडोरेसीरहै, लगी उसासनि साथ ॥४१८॥
इधर आवैहै, उधर चलीजायहै, फिर छः सातक हाथ
चलती है उसासोंके साथ लगी हिंडोरे पर चढ़ीसी रहती है
आशय यह कि, सांस छोडनेसे बढ़ै है और लेनेसे हटैहै।
उपमेयलुप्ता ॥ ४१८ ॥
फिरि फिरि बूझति कहि कहा, कहो साँवरे गात ।
कहा करत देखे कहां, अली चली क्यों बात४१९
प्रेमके मारे सखीसे वारंवार बूझती है कह तो साँवरे शरी-
रने क्या कहाहै, कृष्ण तुमने क्या करते हुए कहां देखे, और
उनके समीप मेरी चर्चा कैसे चली। प्रेमालंकार ॥ ४१९ ॥
जोन्ह नहीं यह तम यहै, किये जु जगत निकेत ।
होतउदयशशिकं भयो, मानहु शशिडरिसित४२०
हे सखी ! यह चांदनी नहीं वही अंधकार है जिसने जगत
में अपने घर कियेथे चन्द्रमाके उदय होतेही मानों सहमकर
धोला होगया है । उत्प्रेक्षा- चांदनी सुखदाई होती है यह
दुःखदहै प्रोषितपतिका० ॥४२०॥