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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

चतुर्थशतक ४. (१२५)
खेलमें क्या लोगे अपनी अटपटी बात छोडो मेरे शपथ
करते करते प्यारीकी भौंहें कुछ हँसौहीं हुई हैं आशय यह
कि, प्रीतम मनाने आये तो दूसरीकाही नाम निकल गया
इससे फिर प्यारी रूठी इसपर सखीने हँसीमें डालकर
कृष्णसे कहा ये चिढानेकी बातें छोडदो। हेतु ॥ ३७३ ॥
चलो चले छुटिजायगो, हठि रावरो सँकोच।
खरे बढाये होत अब, आये लोचन लोच ॥ ३७४॥
हे प्रीतम ! चलो तो आपके चलनेसे सब हठ छुटजायगी
तुम्हारे संकोचसे जो अति चढायेथे वे नेत्र अब नरमीपर आये
हैं अर्थात् इस समय कुछ क्रोध न्यून हुआ है चलनेका समय
है शीघ्र चलो ॥ ३७४ ॥
अनरसहूँ रस पाइये, रसिक रसीली पास ।
जैसे साँठेकी कठिन, गाँठें भरी मिठास ॥३७५॥
हे प्रीतमरसिक ! उस रसीलीके पास चलनेसे अनरसमें
भी रस पाओगे जैसे गन्नेकी गांठ कठिन है परन्तु मिठासमें भरी
है आशय यह कि, उसका मानभी देख प्रसन्न होगे। दृष्टान्ता-
लंकार ॥ ३७५ ॥
क्यौंहूँ मंत्र बात न लगे, थाके भेद उपाय ॥
हठ दृढ गढबैठी सुकवि, लीजे सुरंग लगाय॥ ३७६