बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२६ ) सतसई-सटीक ।
किसी प्रकारकी हमारी बलकी बात नहीं लगती, हम
भेद और उपायसे हारगईं, वह दृढ हठ किला ग्रहण कर बैठ-
गई है उसे सुरँग लगाय कर लीजे। भेद-साम दाम दण्ड भेद
यह चार हैं ॥ ३७६ ॥
सकत न तब ताते वचन, मो रसको रस खोय ।
क्षण क्षण औटे क्षीरलौं, खरो सवादल होय ३७७॥
शठ नायकका वचन अधीरा माननी नायकासे, तेरे तत्ते
वचन मेरे अनुरागके स्वादको नहीं दूर करसकते मेरा प्रेम
क्षण क्षणमें औटे दूधके समान अति स्वादिष्ट होता है अर्थात्
मानिनी उसको दुर्वचन कहती है और वह उसको सुन प्रसन्न
होताहै। उपमालंकार ॥ ३७७ ॥
सकुचि न रहिये श्याम सुनि, यह सतरोहे वैन ।
देत रचैाहे चित कहैं,नेह नचौहे नैन ॥ ३७८ ॥
हे श्याम ! यह सतरोहे क्रोधके वचन सुनकर संकोचित
होकर न रहिये, प्रेमसे रंगे नेत्रही कहेदेते हैं कि, चित्त प्रेमसे
रच रहा है ॥ ३७८ ॥
आये आप भली करी, मेटन मान मरोर ।
दूर करो यह देखि है,छला छिगुनियां छोर ३७९॥
आप मानकी मरोर मेटने को आये यह बहुत अच्छी करी