बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२४ ) सतसई-सटीक ।
हरका फूल नहीं भाता ‘अथवा यह मतिकी भूल है जो
अपनी बड़ाईसे प्रसन्न होय है माननीके निकट सौत प्रसन्न
हो आकर बैठी थी उसपर सखीने कहा’ अथवा मूर्खोंमें अपनी
बड़ाईसे प्रसन्न होनेपर । अन्योक्ति ॥ ३७० ॥
अनियारे दीरघनयन, किती न तरुणिसमान ।
वह चितवनि औरेकछू, जिहिंवशहोतसुजान ३७१
नोकीले और दीर्घनेत्रोंकी कितनी एक स्त्री; समान होती
है परन्तु जिसके वश चतुर होते हैं वह चितवन कुछ औरही
है । भेदकातिशयोक्ति ॥ ३७१ ॥
हाहा वदन उघार दृग, सफल करै सब कोय ।
रोज सरोजनके परै, हँसी शशीकी होय॥३७२॥
रात्रिके समय दूतीने प्यारीसे कहा, हा कष्ट! अथवा हाहा
खाऊं तनक मुख तो उघार सबही कोई अपने नेत्र सफल करें
तेरे मुख उघाडनेसे कमलोंको शोक होगा और चन्द्रमाकी हँसी
होगी आशय यह है कि, तेरे मुखचंद्रसे कलंकित चंद्र हास्य
को प्राप्त होगा कमल कुँभिलायेंगे तेरा मान छूटनेसे मुख
उघडेगा तो यह सब वार्ता होंगी ॥ ३७२ ॥
कहालेहुगे खेलमें, तजौ अटपटी बात ।
नेक हँसौहीं है भई, भौंहैं सौहें खात ॥ ३७३ ॥