बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थशतक ४. ( १२१ )
गुडहरका फूल कहा है कि, जहां यह रहता है वहां क्लेश
रहता है। वाचकलुप्ता लोकोक्ति ॥ ३६० ॥
खरे अदब अठिलाहटी, उर उपजावत त्रास ॥
दुसहशंक विषकी करै, जैसे सोंठमिठास ॥ ३६१ ॥
प्यारीका सभ्यतासे इठलानाभी मेरे मनमें दुःख उपजाता
है जैसे सोंठका मिठास विषकी दुःसह शंका उत्पन्न करताहै
सोंठका मिठास विषयुक्त जानना। दृष्टान्त ॥ ३६१ ॥
दोऊ अधिकाई भरे, एक गो गहराय ॥
कौन मनावै को मनै, मानै मति ठहराय ॥ ३६२ ॥
दोनों पियप्यारे गर्वभरे एकही गाँकी बात करते हैं कौन
मनावै कौन मनै जब इनकी मति ठहरावेगी तब आपही मनेंगे
प्रणयके कलहको मान कहते हैं। काव्यलिंग ॥ ३६२ ॥
हाँसि हँसाय उर लाय उठि, कहिन रुखाहैं वैन।
जकित थकितसे ह्वैरहे, तकत तिरीछे नैन ॥ ३६३ ॥
हँसकर हँसाकर उसे हृदयसे लगाय उठ रूखे बचन
मत कहे इत जकड़े और थकेसे होकर मेरे तिरछे नेत्रोंको
प्रीतम देखते हैं। वृत्त्यनुप्रास ॥ ३६३ ॥
मान करत बरजत नहीं, उलट दिवावत माँह।
करै रिसौहीं जायगी, सहजहँसाहीं भौंह ॥ ३६४ ॥