बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थशतक ४. ( १२३ )
तू अपने मनमें विचार करले कि, भौंरा आककी कलीसे
विहार नहीं करता है नायकको अन्यसे रति करनेवाला जान
प्यारीने मान किया इसपर सखीने समझाया । छेकानुप्रास
जमक ॥ ३६७ ॥
तो रस राच्यो आन वश, कहै कुटिल मति क्रूर॥
जीभ निबौरी क्यों लहै, बौरी चाख अँगूर ३६८॥
वह तो तेरे रसमेंही रँगरहे हैं उन्हें औरके वश किसी खोटे
मतिवाले क्रूरने कहा है यह सत्य मत जाने, हे बावरी ! जिसने
अंगूर खाये हैं इसकी जीभमें निबोली क्यों भावेगी । न्यासा-
लंकार ॥ ३६८ ॥
गहिरी गरब न कीजिये, समय सुहागहि पाय ॥
जीकी जीवन जेठलों, माह छांह सुहाय ३६९
हे मानिनी ! समय समय सुहाग पाकर बहुत मान मत
करो जेठ महीनेकी जीकी जीवनछाया माहमें अच्छी नहीं
लगती गहरी-वा गहली-मानिनी । दृष्टान्तालंकार ॥ ३६९॥
बहकि बड़ाई आपनी, कत राचत मतिभूल ।
बिनमधु मधुकरके हिये, गड़े न गुड़हरफूल ३७०
बहककर अपनी बड़ाईसे हे मतिभूल ! क्यों प्रसन्न होती
है तू सुन्दरी है परन्तु उसके विना भौंरेके हृदयमें गुड़-