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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 175

( १२२ ) सतसई-सटीक ।
मान करतेमें बरजती नहीं और उलटी सौंह दिवाती है
क्या तुम यह स्वभावसे हँसौही भौंहें रिसभरी करेही जाओगी
मान दृढ करनेको सखीने यह वचन कहे । काकोक्ति छे-
कानुप्रास ॥ ३६४ ॥
जो चाहत चटक न घटै, मैलो होय न मित्त ।
रज राजस न छुवाइये, नेह चीकने चित्त ॥ ३६५॥
हे मित्र ! जो तुम चाहो कि, प्रेमकी चमक न घटै और मित्र
का मन अप्रसन्न न हो तो नेहसे चिकने हुए चित्तमें रजोगुणकी
धूरि मतछुवाओ आशय यह कि प्रीतमपर आज्ञाबल मतचला
ओ श्लेषालंकार ॥ ३६५ ॥
सोंहैंहूं चाह्यो नतैं, किती दिवाइ सौंह ॥
एहो क्यों बैठी किये, ऐंठी ग्वैंठी भौंह ॥ ३६६॥
तैने मानसे प्रीतमके सन्मुखभी न देखा, मैंने कितनी सौ-
गंधभी दिवाई, फिर अब क्यों टेढी गठीली भौंहकिये बैठी है।
वृत्यनुप्रास ॥ ३६६ ॥
खरी पातरी कानकी, कौन बहाऊवानि ॥
आककलीन रलीकरे, अली अली जियजानि ३६७
हे सखी ! तू कानकी बहुत हलकी है जो कोई बात कहै
उसे तू मान जाय है इस तेरी बान स्वभावमें बहाऊँ हे आली