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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 173

( १२० ) सतसई-सटीक ।
हो हाथ पसीजते हैं इससे तुम उठजाओ तो महँदी सूखे ।
हेतु विकृति० ॥ ३५७ ॥
चितवनि रूखे दृगनिकी, हाँसी बिन मुसिकान ।
मान जनायो माननी, मानलियो पियजान ३५८
सूखे नेत्रोंकी चितवन और बिनमुसकानकी हांसीसेही
प्रीतमको माननीने मान बताया, और चतुर प्रीतमने जान-
लिया। लाटानुप्रास ॥ ३५८ ॥
पति ऋतु अवगुण गुणबढत, मान माँहको शीत।
जात कठिनहै अतिमृदौ,रमणीमननवनीत ३५९
पतिके अवगुणसे मान और ऋतुके गुणसे माहका शीत
बढता है रमणीका मन और मक्खन अति कोमलहैं तथापि
कठिन हो जाता है। दृष्टान्तरूपक ॥ ३५९ ॥
वाही निशितें ना मिटो, मान कलहको मूल ।
भले पधारे पाहुने, है गुडहरको फूल ॥ ३६० ॥
उसी रातसे क्लेशका मूल मान नहीं मिटा गुडहरके फूल
के समान हाकर पाहुने भले पधारे हैं आशय यह कि, रात-
को कहीं और रहकर सबेरेको रतिचिह्नसे युक्त माथेपर
महावर पलकों में पीकादि लगाकर प्रीतमआये इस कारण