बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
तृतीयशतक ३. (९७)
बालक लेनेके बहाने वह छैल ढीट मेरे निकट आकर
अचानक मेरी छातीमें अपनी अंगुरी छुवाय गया 'पर्यायोक्ति'
नई लगन कुलकी सकुच, विकलभई अकुलाय ।
दुहूँओरऐंचीफिरै, फिर कीलौं दिनजाय ॥२८४॥
नई प्रीति और कुलकी सकुचसे घबराकर व्याकुलहो
दोनों ओर खिचीहुई फिरकीके समान फिरती है, इधर
उधरकी खिचावटमेंही दिन जाता है, कभी प्रीतमका ध्यान
कभी घरका संकोच 'उपमेयलुप्त' परकीयामध्यानायिका २८४
झटकि चढ़ति उतरति अटा, नैकनथाकतिदेह ।
भई रहत नटको बटा, अटकी नागरिनेह॥२८५॥
झट चढ़ती है, और झट अटारीसे उतरती है, देह थकता
नहीं है वह नागरी (चतुर) नेह लगनेके कारण नटका चट्ट
वट्ठाहुई रहती है 'विशेषोक्ति रूपक' ॥ २८५ ॥
इतते उत उतते इतै, क्षण न कहुँ ठहराति ।
कलनपरति चकई भई, फिरि आवति फिरि जाति॥
इधरसे उधर उधरसे इधर फिरती है क्षणभर कहीं नहीं
ठहरती कलनहीं पड़ती चकईके समान प्रीतमके देखनेको
फिर २ आती और जाती है 'उपमेयवाचक लुप्तोपमा' २८६
तृतीय भाग: दोहा ३५१ से ५५० (नीति-विचार, वियोग-वर्णन एवं रूपक)
( ९८ ) सत्सई-सटीक ।
उरउरझो चितचोरसों, गुरुगुरुजनकी लाज ॥
चढ़े हिंडोरेसे हिये, किये बनै गृहकाज ॥२८७॥
मनतौ चित्तचोरसे उलझ रहा है उधर गुरुजनोंकी लज्जा
है हिंडोलेसे हियेपर चढ़करभी बालाको घरका काम कियेही
बनता है आशय यह है कि, डांवाडोल मनसे घरका काम करै
है 'छेकानुप्रास' ॥ २८७ ॥
उनिहरकी हँसिकै उतै, इनसौंपी मुसिक्याय ॥
नैनमिलेमनमिलगयो, दोऊमिलवतगाय॥२८८॥
प्रीतमने हँसकर अपनी गौ प्यारीकी ओर हांकी प्यारीने
हँसकर प्यारेको सौंपी, नैन मिलतेही मन मिलगया, जिस
समय गाय मिलाई द्वितीय असंगति । हरकी-हांकी॥२८८॥
उनको हित उनहीं बनै, कोऊ करो अनेक ।
फिरतकाकगोलकभयो, दुहूँदेह ज्यौंएक ॥२८९॥
दोनोंका हित उन्हीं दोनोंसे बन आता है और कोई
कितनीही करो नहीं बनता दोनोंके शरीरमें एकही जीव कौ
एकी आंखके समान कभी इधर कभी उधर फिरता है
'दृष्टान्त' ॥ २८९ ॥
याके उर औरै कछू, लगी विरहकी लाय ।
पजरैनीर गुलाबके, पियकी बात बुझाय ॥२९०॥
तृतीयशतक ३. ( ९९ )
इसके हियेमें औरही कुछ विरहकी बुरी आग लगी है
गुलाबका जल छिड़कनेसे बलती है और प्रीतमकी बात
करनेसे बुझती है प्रोषितपतिका आग पानीसे बुझती है
परन्तु विरहाग्नि पानीसे बढी. बात-हवासे अग्नि बढती है
यहां बात वार्त्तासे बुझी यह विरुद्धते कार्य हुआ 'विभावना
लंकार' ॥ २९० ॥
तियनियहियजुलगी चलत,पिय नखरेख खरोट।
सूखनदेत न सरसई,खोंटिखोंटिखतखोट २९१॥
चलते हुए प्यारीके हृदयमें जो प्रीतमके नखके खरोंट-
की रेखा लगी है, सो उस क्षतके अंकुरको नखसे कुरेद २
कर उसका गीलापन नहीं सूखने देता यही खोट है. याद
रखनेके निमित्त उपाय है 'अनुज्ञा' ॥ २९१ ॥
बसि सङ्कोचवश रावनवश, साच दिखावति बाल ।
सियलौं शोधतितियतनुहिं,लगनि अगनिकी ज्वाल
प्यारी रावणरूपी लाजके वशमें रहकरभी अपना सत दिखा-
ती है, और शरीरको लगनरूपी अग्निकी लपटमें सीताजीकी
समान शुद्ध करती है अर्थात जैसे रावणके वशमें
आनकर जानकीने अग्निमें अपना शरीर शोधा था, उसी
प्रकार प्यारीभी अब लाज छोड़ संकेतमें आई है, और तुम्हें
सत दिखानेको उत्सुक है इसमें है लाज रूपी रावण, और
( १०० ) सतसई-सटीक ।
रावणके यहां जानकी जैसे रामका ध्यान करतीथीं इसी
प्रकार लाजके वश यहभी तुम्हाराही ध्यान करती है, सो
चलकर देखो 'पूर्णोपमालंकार' ॥ २९२ ॥
नैकु नझुरसी विरह झर, नेहलता कुँभिलाति ।
नित नित होत हरीहरी, खरी झालरति जाति २९३
विरहाग्निकी लपटसे झुलसकै प्रेमकी लता कुछभी नहीं
कुँभलाती, प्रतिदिन हरी भरी हुई बढती जाती है, झालरति
बढती है 'विशेषोक्ति' ॥ २९३ ॥
खल बढई बलकरिथके, कटै न कुवत कुठार ।
आल वाल उरझालरी, खरी प्रेम तरुडार ॥२९४॥
हे सखी दुष्टरूप बढई बलकर हारगये उनके कुवचन
रूपी कुल्हाडेसे नहीं कटता, थांवलेरूपी हृदयमें प्रेमवृक्षकी
डाल बढतीही जाती है 'रूपक विशेषोक्ति' ॥ २९४ ॥
करत जात जेती कठिन, बढिरस सरिता सोत ।
आलवाल उर प्रेमतरु, तितौ तितौ दृढहोत २९५
रसरूपी नदीका सोता बढकर जितनी काट करता जाता
है, थाबलेरूप हृदयमें प्रेमका वृक्ष उतना उतनाहीं दृढ
होता जाता है कटन-किनारेका काटना 'विरोधाभास' २९५॥
तृतीयशतक ३. ( १०१ )
बाल वेलि सूखी सुखद, इहि रूखे रुख घाम ।
फेरि डहडही कीजिये,सुरस सींचि घनश्याम ॥
बेलीके समान वह सुखदायक बाला तुम्हारे रूखे पन-
की धूपसे सूखगई हे हे घनश्याम अब उसे सुरससे सींचकर
हरी कीजिये घाम-धूप। घनश्याम-कृष्ण या मेघ।रस-जल-
और प्रीति। 'परिकरांकुर' ॥ २९६ ॥
देखत ह्वै कपूरलौं, उडैजाय जिनलाल ।
छिन छिन जातपरीखरी, छीन छवीलीवाल २९७
हेलाल वह छवीली क्षणक्षणमें क्षीण पड़ती जातीहै, देखते
देखते न्यून हुई जातीहै, कहीं कपूरके समान उड़नजाय
विरह निवेदन 'पूर्णोपमा वीप्सा' ॥ २९७ ॥
कहा कहौं वाकी दशा, हरि प्राणनके ईश ।
विरहज्वाल जरबो लखै, मरिबोभयोअशीश२९८
हे प्राणेश्वरहरि ! में उसकी दशा क्याकहूँ विरह
अग्निमें जलना हुआ देख उसके लिये मरनाही आशीर्वादहै
'लेशाऽलंकार' ॥ २९८ ॥
हरि हरि वरि वरि करि उठति, करि थकी उपाय।
वाको ज्वर बलि वैद ज्यौं, तोरसजायनोजाय२९९
( १०२ ) सतसई-सटीक ।
हे प्रीतम वियोगमें वह हरिहारि बलि अर्थात् जली २ कह
उठती है,हम उपायकर हारगईं उसकी ताप बली बैदकी भाँ-
ति तुम्हारे रस (प्रेमभरे वाक्य पक्षान्तरमें फुंकीधातु) से जा-
य तो जाय 'वृत्यनुप्रास और श्लेष' ॥ २९९ ॥
यह विनशत नगराखिकै, जगत बडो यशलेहु ।
जरीविषमज्वर जाय यह,आय सुदर्शन देहु ३००
यह स्त्रीरूपी रत्न नाश होताहुआ रखकर जगत्में यशलो
वियोगरूपी विषमज्वरसे जली जाती है, आनकर अपना
सुन्दर दर्शन दीजिये, सुदर्शन चूर्णभी विषमज्वरपर प्रसिद्ध
है, सो दर्शनरूपी चूर्ण माँगती है 'श्लेषालंकार' ॥ ३०० ॥
विहारीकी सतसईमें पण्डित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकासहि-
त तीसरा शतक पूर्ण हुआ ३ शुभमस्तु ।
नैक न जानी परत यों, परो विरह तनु छाम ।
उठति दियालौं बाढि हरि,लिये तुम्हारो नाम ॥
वह कुछ भी जानी नहीं जाती विरहसे शरीर उसका
क्षीण होगया है परन्तु तुम्हारे नाम लेनेसे दियेके समान
चैतन्य हो उठती है । 'उपमालंकार' ॥ ३०१ ॥
मैं ले दयो लयो सुकर, छुवति छनकिगो नीर ।
लाल तिहारो अरगजा,उरलगि भयो अबीर ३०२
चतुर्थशतक ४. (१०३)
मैने जो तुमसे लेकर प्रियाको दिया सो उसने सुन्दर
हाथमें ग्रहणकिया, उसके हाथमें छूतेही पानी जलगया हे
लाल! तुम्हारा दिया अरगजा उसके हृदयमें लगकर अङ्गार
होगया पानी सूखकर श्वेतता होगई विरह वर्णन। "अयुक्ता-
लंकार" ॥ ३०२ ॥
हितकरितुमपठयोलगै, वा विजनाकी बाय ।
टरी तपन तनुकी तऊ, चली पसीना न्हाय ॥ ३०३ ॥
तुमने जो प्रेमकर पंखा भेजा उसकी पवन लगनेसे शरी-
रकी गरमी तो गई परन्तु पसीनेमें न्हागई सात्त्विकभाव प्रगट
होनेसे पसीना आया । 'पंचम विभावना' ॥ ३०३ ॥
हँसि उतार हियते दई, तुम जो तादिन लाल ।
राखत प्राण कपूरलों, वहै गुंजकी माल ॥ ३०४ ॥
आपने जो हँसकर उस दिन हृदयसे उतारकर माला दी
हे हे कृष्ण ! वही घोंटलीकी माला उसके प्राणोंको कपूरकी
भाँति रक्षा करती है कपूरमें घों
( १०४ ) सतसई-सटीक ।
हे कृष्ण ! (वह विरहनी तुम्हारे अनुरागमें) तुम्हारे मिल-
नेकी कामनासे सुखको होमती है प्रीतिकी आगकी लपटमें
मैने उसे ज्वालामुखीके समान जलते देखाहै अथवा लगन-
रूपी अग्निकी ज्वाला ज्वालामुखीसी जलती है, 'सविषय-
सावयव' ॥ ३०५ ॥
थाकी यतन अनेक करि, नेक न छाँडति गैल ।
करी खरी दुबरी सुलगि, तेरी चाहचुरैल ॥ ३०६ ॥
हम अनेक यत्न करके थकगईं, परन्तु वह नेकभी
पीछा नहीं छोडती तुम्हारी चाहरूप चुडेलने चिपटकर उसे
अति दुर्बल करदिया है ॥ ३०६ ॥
लाल तिहारे विरहकी, आगिनि अनूप अपार ।
सरसै बरसै नीरहूं, झरसे मिटै न झार ॥ ३०७ ॥
हे लाल ! तुम्हारे विरहकी अग्नि अनूप और अपार है बर-
से पानीकी भांति बढती है और झडसे लपटभी नहीं मिटती
अद्भुत रसमें विरहनिवेदन है 'पंचम विभावना' ॥ ३०७ ॥
जो वाके तनुकी दशा, देखो चाहत आप ।
तो चलि नेकविलोकिये, चलिऔचक चुपचाप ॥
चतुर्थशतक ४. (१०५)
हे कृष्ण ! जो उसके शरीरकी दशा आप देखना चाहते
हो तो चुपचाप औचक चलकर देखिये [ बलि-बलिहारी
जाऊँ ] काव्यलिंग संभावना । आशय यह कि, तुम्हें देख
मोटी होजायगी ॥ ३०८ ॥
लई सौंहसी सुननकी, तजि मुरली धुनि आन ।
कियेरहतनितरातदिन, कानन लागे कान ३०९॥
वंशीकी टेर सुनकर मानों और बातके सुननेकी इसने सौ-
गंधसी खारक्खी है रात दिन वंशीका ध्यान वनकी ओर का-
न लगाये किये रहते हैं । 'उत्प्रेक्षा' ॥ ३०९ ॥
उर लीने अति चटपटी, सुनिमुरलीधुनिधाय ।
हों हुलसी निकसीसुतौ, गो हुलसी हिय लाय ३१०
मुरलीकी ध्वनि सुन हृदयमें अति चटपटी लिये धाव-
मान हुई ज्यों मैं प्रसन्न हो बहर निकली सो वह मगन ह्वै
मेरी छातीमें हुलसी लगाकर गये । 'यमकालंकार' ॥३१०॥
सुनति न ताल रुतानकी, उठै न सुर ढहगाय ।
एरी राग विगारिगो, वैरी वोल सुनाय ॥ ३११ ॥
तालके स्वरकी सुरत नहीं सुर ठहरके नहीं उठता, एरी
सखी वह वैरी अपना बोल सुनाकर मेरा राग बिगाड़गया;
( १०६ ) सतसई सटीक ।
अर्थात् स्वर भंग हुआ और शब्द सुनाकर जो प्रीतम न ठहरे
इससे वैरी कहा। 'छेकानुप्रास' ॥ ३११ ॥
चितवन भौरे भायकी, गोरे मुख मुसक्यान ।
लगनि लटकिआली गरे,चितखटकतनितआन॥
उसका भोरे भायसे देखना, और गोरे मुखकी मुसकान
लगना लगाना लटकके सखीके गरे यह बात नित्य मेरे शरी-
रमें आनकर खटकती है। 'स्वभावोक्ति' ॥ ३१२ ॥
क्षण क्षणमें खटकत सुहिय, खरी भीरमें जात ।
कही जु चलि बिनही चितै, ओठनहीमें बात ३१३
क्षण क्षणमें वह बाला मेरे मनमें खटकती है, बड़ी भीरमें
जाते हुए वह देखकरहोठोंहीमें बातकहकर चली।'स्मृति' १३३
चिलक चिकनई चटकसों,लफति सटकलोंआय।
नारि सलोनी साँवरी, नागिनलों डसिजाय॥ ३१४
चसक चिकनाईकी चटकसे लचकती हुई पतली छड़ीके
समान आकर वह सांवरी सलोनी बाला नागिनिके समान
डस जाती है; आशय यह कि, प्रिया विना मन व्यग्र है।
'पूर्णोपमा' ॥ ३१४ ॥
डग कुडगतिसी चलि ठठक,चितई चली निहारि।
लियेजात चित चोरटी, वहै गोरटी नारि ॥३१५॥
चतुर्थशतक ४. (१०७)
डग मग पैरसे डिगती हुई एक पग चलकर ठिठकगई और
फिर मेरी ओर देखा, वह चोटी गोरी नारी मेरा चित्त चुराये
लिये जातीहै। 'स्वभावोक्ति' अथवा ठिठकती हुई थान छू-
कर चली आधी चितवनसे देखा, इत्यादि ॥३१५॥
भौंह ऊँचे आँचर उलटि, मोरि मोरि मुख मोर ।
नीठ नीठ भीतर गई, दीठि दीठिसों जोर ॥३१६॥
भौंहकी चेष्टा ऊँची कर आँचरको उलट ऐंडाय जँभाय-
कर वा घूमकर-किसी भांति दृष्टिसे दृष्टि जोरकर भीतरको
गई। 'स्वभावोक्ति' ॥ ३१६ ॥
रहो मोह मिलनी रहो, यों कहि गहो मरोर ।
उत दै सखिहि उराहनो, इत चितई मो ओर ३१७
अब हमारी तुम्हारी प्रीति और मिलना हो चुका, यों क-
हकर मरोर की; उधर सखीको उरहना दिया और इधर मेरी
ओर देखा । 'गूढोक्ति' ॥ ३१७ ॥
चुनरी श्याम सुतार नभ, मुखशशिकी अनुहारि ।
नेह दवावत नींदलों, निरखि निसानी नारि ३१८॥
. रात्रि और बालाका रूपक, काली चुनरी श्वेत चित्तीवालीही
मानों तारोंसहित आकाश है, मुख चन्द्रमाके समान है, जिसमें
( १०८ ) सतसई-सटीक ।
उस ( निसानी ) रात्रिके समान स्त्रीको देखा है तबसे नींदके
समान उसकी प्रीति मुझे अचेत करती है । 'रूपक'॥३१८॥
फेर कछूकरि पौरते, फिरि चितई मुसक्याय ।
आई जामन लेनको, नेहै चली जमाय ॥ ३१९ ॥
फिर कछ करके उसने पौरीसे लौट पीछे फिर मुसकाकर
देखा जामन लेनेको आईथी पर प्रीतिको जमाचली। असंगति
और 'पर्यायोक्ति' ॥ ३१९ ॥
देह लगी ढिग गेहपति, तऊ नेह निरवाहि ।
ढीली अँखियनही इतै, गई कनखियन चाहि ३२०
मेरे शरीरसे लगा हुआ उसका पति मेरे निकट था, तौ
भी वह अपनी प्रीति निबाह गई, अर्थात् ढीली आँखोंसेही
कनखियोंद्वारा इधर देखगई । 'पंचमविभावना' ॥ ३२० ॥
लहि सूने घर कर गहो, दिखा दिखीकी ईंठि ।
गड़ी सुचित नाहीं करत, कर ललचोंही दीठि ३२१
सूना घर देखकर मेरा हाथ पकड़ लिया, देखा देखीका
इष्टकर हाथ पकड़नेपर वह नहीं करती है और लालच भरी
दृष्टि करके चित्तमें गड़ी है ॥ ३२१ ॥
कालबूत दूती बिना, जुरै न और उपाय ।
फिर ताके तारे बनै, पाके प्रेम लदाय ॥ ३२२ ॥
चतुर्थशतक ४. (१०९)
प्रेमरूपी लड़ावका निर्वाह कालबूतरूप दूतीके बिना
और उपायसे नहीं मिलता, और प्रेम लड़ावके पकनेसे फिर
उसका टालनाही बनता है।'रूपकालंकार'अर्थात प्रेम उत्पन्न
करदेना दूतीका कार्य है प्रेम होजानेपर उसकी आवश्य-
कता नहीं ॥ ३२२ ॥
तोपर वारों उरवसी, सुन राधिके सुजान ॥
तू मोहनके उरवसी, है उरवसी समान ॥३२३॥
हे सुजान राधिके! मैं तुझपर उरवसी बलिहारी करताहूं,
तू मोहनके हृदयमें बसी उर्वशीके समान है. यहां उरवसीसे
लक्ष्मी और हमेलके समान है जैसे उनके हृदयमें लक्ष्मी
निवास करती है इस प्रकार तू है और जैसे छातीपर
धुकधुकी होती है ऐसे तेरी सौन है परन्तु तू विशेष है।
'यमक' ॥ ३२३ ॥
तू मोहनमन जडरही, गाड़ी गढ़नि गुवालि ।
उठ सदा नटसाललौं, सौतिनिके उर शालि ३२४
हे ग्वालिनी ! तू मोहनके मनमें गाड़ी गड़नेसे गड़रही है
और तू सौतोंके हृदयमें सदा टूटे काँटेकी भांति कसक-
ती है, अर्थात् गड़ी मोहनके हृदयमें कसकती सौतोंकेमें
है । 'असंगति अलंकार' ॥ ३२४ ॥
(११०) सतसई-सटीक।
पियमन रुचि हैबो कठिन, रुचि न होत शृंगार।
लाख करो आँखि न बढ़े, बढ़े बढ़ाये बार॥३२५॥
प्रीतमके मनमें रुचि होनी कठिन है; शृंगारको रुचि नहीं
होती. लाख करो आंखिनहीं बढ़ेगी, बढ़ानेसे विलम्ब बढ़ेगा।
अभिसारके निमित्त देर होतेमें सखी वचन अथवा लाख यत्न
करो बढ़ायेसे आंख नहीं बढ़ती परन्तु विलम्ब बढ़ताहै-आशय
यह कि, बाला सौतनको शृंगार करते देख मनमें विचारने लगी
कि, प्रीतमका मन इससे न लगजाय उसपर सखीने सावधान
किया। 'दृष्टान्तालंकार'॥ ३२५ ॥
जालरंध्र मग अगनिको, कछु उजाससों पाय।
पीठ दिये जगसों रहै, दीठि झरोखा लाय॥३२६॥
झरोखोंके छिद्रोंके मार्गमें कुछ उजालासा पाकर झरोखेमें
दृष्टि लगाय जगके लोगोंसे मुख फेरे रहतीहै; आशय यह कि,
सबसे मुख फेर आपहीके देखनेकी अभिलाषा कियेरहती है।
'परिसंख्या'॥ ३२६॥
यद्यपि सुन्दर सुघर पुनि, सगुनो दीपकदेह।
तऊ प्रकाश करै तितो, भरिये जितो सनेह ३२७
प्रीति बढ़नेका कारण सुन्दर घर (घट) गुणसहित है
और दीपकसी देह है तौभी उतनाही प्रकाश करताहै जितना
" -> no space, "क्यों न होय बेहाल ।"
Let's check line 17:
"यह कुटिल कटाक्षक वाण लगनेमें क्यों न प्रीतम बेहाल"
Wait, is it "कटाक्षक" or "कटाक्षके"?
Look at line 17:
"कटाक्षक" -> wait, look above the 'क':
Is there an 'े' matra?
Yes! There is a slant stroke above 'क': "कटाक्षके"!
Wait, let's look at it:
"कटाक्षके वाण लगनेमें" -> yes, grammatically and typographically "कटाक्षके"!
Let's check line 18:
"हों यद्यपि कलेजेमें लगकर पार होजातेहैं, तोभी फांसकी"
Wait, "हों" or "हौं"?
Look at the first word of line 18:
"हों" or "ह्वै"?
It has 'ह' + 'ो' + bindi = "हों".
Wait, could it be "ह्वै"? No, "हों".
Then "यद्यपि कलेजेमें लगकर पार होजातेहैं, तोभी फांसकी"
Wait, is it "होजातेहैं,"?
Yes.
Let's check line 19:
"समान खटकतेहैं । 'विभावना' ॥ ३३० ॥"
Let's check line 1:
"चतु
(११२) सतसई-सटीक ।
नागरि विविध विलास तजि, बसी ग्वेलन माँहि।
मूढोंमें गनिबो करै, हूठो द अठिलाहि ॥३३१॥
हेनागरि ! तू अनेक विलास त्यागन कर गँवारियोंमें आन-
कर बसी है यह तुझे मूर्खोंमें गिनकर धक्का दे इठलाती है।
'पर्यायोक्ति' प्रिया मानकर गँवारियोंमें जाबैठी वहां सखीने
कहा ॥ ३३१ ॥
रही लटू है लालहों, लखिबो बाल अनूप ।
कितो मिठास दियो दई,इते सलौने रूप ॥३३२॥
हेलाल ! मैंभी तो उसका अनूपरूप देखकर लट्टू
होगई, विधाताने उसके सलौने रूपमें कितना मिठास दिया
है। 'विरोधाभास' ॥ ३३२ ॥
तीजपरब सौतिन सजै, भूषण वसन शरीर ।
सबै मरगजे मुखकरी,वही मरगजे चीर ॥३३३॥
सावनकी तीजके त्यौहारमें सौतोंने शरीरपर भूषण वस्त्र
सजाये, परन्तु प्यारीने उसी मिलगिजे वस्त्रसे सबका मुख
मर्दित करदिया, अर्थात् जो बात और शृंगार करके नहीं
प्राप्त करसकती, वह यह मिलगिजे वस्त्रसे करती है ॥३३३॥
सोहत धोती श्वेतमें, कनकवरण तनु बाल ।
शारदवारद बीजरी, भारद कीजतु लाल॥३३४॥
चतुर्थस्तवक ४. ( ११३ )
हेलाल ! श्वेतधोतीमें उस बालाका सुवर्णके समान शरीर
शोभायमान होता हुआ शरद् ऋतुके मेघोंमें बिजुलीकी
शोभाको मात करताहै । प्रतीप और वृत्त्यनुप्रास ॥३३४॥
हों रीझी लखि रीझिहो, छविहि छबीले लाल ।
सोनजुहीसीहोतिद्युति,मिलत मालतीमाल ३३५
मैं तो रीझीहूं और तुमभी उसकी छविको देखकर रीझोगे
हे छबीले लाल ! चमेलीकी माला पहननेसे उसकी शोभा
सोनजुहीसी होतीहै । तद्गुणालंकार ॥ ३३५ ॥
क्षणक छबीले लाल वह, ज्यौँलगि नहिं बतराय ।
ऊप मयूख पियूषकी,तौलगि भूख न जाय ३३६
हे छबीले कृष्ण ! एक क्षणको जब तक वह नहीं बोलती
तब तक गन्ना, मधु, और अमृतरसकी भूख नहीं जाती ।
वृत्त्यनुप्रास ॥ ३३६ ॥
टोरी लाई सुननकी, कहि गोरी मुसकात ।
थोरी थोरी सकुचसों, भोरी भोरी बात ॥३३७॥
मुग्धाकी बात सुननेकी रट लगाई प्रीतम मुसकराता है
और गोरी बाला थोरी थोरी सकुचमें भोरी भोरी बात
कहती है । छेकानुप्रास और वीप्सा ॥ ३३७ ॥
( ११४ ) सतसई-सटीक ।
नेको उहि न जुदी करी, हरष जु दी तुम माल।
उरते वास छुटो नहीं, वास छुटेहूं लाल ॥ ३३८॥
जो माला तुमने प्रसन्न होकर उसे दी उसे उसने क्षणमात्र
कोभी हृदयसे अलग न किया, हे लाल ! उसकी सुगंधि
जातीरही परन्तु हृदयसे उसका वास न छूटा। यमक॥३३८॥
मोहिं भरोसो रीझिहैं, उझक झांकि इकबार ।
रूप रिझावनहार यह, ये नैना रिझवार ॥३३९॥
मुझे भरोसा है कि, तू एकहीबार उझककर झाँकेगी
तो रीझैगी अर्थात् एकबार तू खिडकीमें झांककर तो देख
उनका रूप रिझानेवाला है, और तेरे नेत्र रीझनेवाले हैं।
समालंकार ॥ ३३९ ॥
ल्याई लाल विलोकिये, जियकी जीवनमूल ।
रही भौनके कोनमें, सोनजुहीसी फूल ॥३४०॥
हे कृष्ण ! मैं लेआईहूं चलकर अपनी जीवनमूलको
देखिये वह भवनके कोनेमें सोनजुहीसी फूल रही है।
उपमा ॥ ३४० ॥
नहिं हरिलों हियरा धरो, नहिं हरलों अरधंग ।
एकतहीं करि राखिये, अंग अंग प्रतिअंग ३४१॥
चतुर्थशतक ४. ( ११५ )
हे कृष्ण ! न तो विष्णुके समान उसके हृदयपरही लक्ष्मी
के समान रक्खो न शिवके समान अर्धांग धारण करो
किन्तु उसके अंग अंग अपने अंग अंग मिला रखिये । दूपणो-
पमा ॥ ३४१ ॥
रही पैज कीन्ही जु मैं, दीन्ही तुम्हें मिलाय ।
राखो चम्पकमालसी, लाल हिये लपटाय ॥ ३४२ ॥
जो मैंने पैज की थी सो पूरी की, तुम्हें मिलादिया हे लाल!
अब चम्पकमालासी हृदयमें लगाकर इसे रक्खो । उपमेय-
लुप्तालंकार ॥ ३४२ ॥
कैबारावत यहि गली, रहे चलाय चलैन ।
दरशनकी साधे रही, सूधे रहत न नैन ॥ ३४३ ॥
हेप्यारी ! मैंने उन्हें कईवार इस गलीमें आते देखा चलने
की इच्छा करें पर न चलें दर्शनकी अभिलाषा करते हैं इस
कारण नेत्र सूधे नहीं रहते आशय यह कि, जब वह गलीमें
आते हैं तब तो सूधे नेत्र मन्दिरके सन्मुख लगे रहते हैं और
जब मंदिरसे आगे चलते हैं तब मंदिरकी ओर होजाते हैं ।
हेतु अलंकार ॥ ३४३ ॥
स्वप्नदर्शन ।
देख्यो जागत वैसिये, सांकर लगी कपाट ।
कित ह्वै आवत जातभाजि, को जाने केहि बाट ३४४
( ११६ ) सतसई-सटीक ।
जागतेहुए देखा कि, किवाँड़में वैसीही साकर लगी है
कौन जाने किधर होकर आते हैं और किस मार्गसे भगजा-
तेंहैं । विभावना ॥ ३४४ ॥
सुखसों बीती सब निशा, मनु सोये इकसाथ ।
मूकामेलि गह्योजु छिन, हाथ न छोड़त हाथ ३४५
सारी रात सुखसे बीती मानो एकसाथही सोये हैं मूके में
डालकर हाथ जो पकड़ा सो एक क्षणमात्रको भी नहीं छोड़ा
मूका-मोखा भट्ठा अथवा स्वम उनको देखतेमें सुखसे सब
रात बीती मानों एक साथही सोये हैं अपने हाथसेही जो
अपना हाथ पकड़ा उसे उनका जानकर एक क्षणमात्र को न
छोड़ा । उत्प्रेक्षा ॥ ३४५ ॥
दुचितैचितहलतिन चलति, हँसतिनझुकतिविचारि
लिखितचित्र पियलखिचितै, रही चित्रलों नारि॥
चित्त दुचिताईमें होरहा है न हलती है न चलती है न
हँसती है न विचारकर क्रोध करती है प्रीतमको चित्र लिख-
ता देख प्यारी स्वयं चित्रके समान होगई दुचितै मन इस
कारण है कि,मेरी मूर्ति लिखै हैं वा अन्यकी हलने चलनेकी
आहट होगी इसकारण नहीं हिलती अपनीही है यह निश्चय
न होनेसे हँसती नहीं, और दूसरीकी कदाचित् न हो यही
विचार क्रोध नहीं करती । संशयालंकार ॥ ३४६ ॥