बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थशतक ४. (१०९)
प्रेमरूपी लड़ावका निर्वाह कालबूतरूप दूतीके बिना
और उपायसे नहीं मिलता, और प्रेम लड़ावके पकनेसे फिर
उसका टालनाही बनता है।'रूपकालंकार'अर्थात प्रेम उत्पन्न
करदेना दूतीका कार्य है प्रेम होजानेपर उसकी आवश्य-
कता नहीं ॥ ३२२ ॥
तोपर वारों उरवसी, सुन राधिके सुजान ॥
तू मोहनके उरवसी, है उरवसी समान ॥३२३॥
हे सुजान राधिके! मैं तुझपर उरवसी बलिहारी करताहूं,
तू मोहनके हृदयमें बसी उर्वशीके समान है. यहां उरवसीसे
लक्ष्मी और हमेलके समान है जैसे उनके हृदयमें लक्ष्मी
निवास करती है इस प्रकार तू है और जैसे छातीपर
धुकधुकी होती है ऐसे तेरी सौन है परन्तु तू विशेष है।
'यमक' ॥ ३२३ ॥
तू मोहनमन जडरही, गाड़ी गढ़नि गुवालि ।
उठ सदा नटसाललौं, सौतिनिके उर शालि ३२४
हे ग्वालिनी ! तू मोहनके मनमें गाड़ी गड़नेसे गड़रही है
और तू सौतोंके हृदयमें सदा टूटे काँटेकी भांति कसक-
ती है, अर्थात् गड़ी मोहनके हृदयमें कसकती सौतोंकेमें
है । 'असंगति अलंकार' ॥ ३२४ ॥