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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

चतुर्थशतक ४. ( ११५ )
हे कृष्ण ! न तो विष्णुके समान उसके हृदयपरही लक्ष्मी
के समान रक्खो न शिवके समान अर्धांग धारण करो
किन्तु उसके अंग अंग अपने अंग अंग मिला रखिये । दूपणो-
पमा ॥ ३४१ ॥
रही पैज कीन्ही जु मैं, दीन्ही तुम्हें मिलाय ।
राखो चम्पकमालसी, लाल हिये लपटाय ॥ ३४२ ॥
जो मैंने पैज की थी सो पूरी की, तुम्हें मिलादिया हे लाल!
अब चम्पकमालासी हृदयमें लगाकर इसे रक्खो । उपमेय-
लुप्तालंकार ॥ ३४२ ॥
कैबारावत यहि गली, रहे चलाय चलैन ।
दरशनकी साधे रही, सूधे रहत न नैन ॥ ३४३ ॥
हेप्यारी ! मैंने उन्हें कईवार इस गलीमें आते देखा चलने
की इच्छा करें पर न चलें दर्शनकी अभिलाषा करते हैं इस
कारण नेत्र सूधे नहीं रहते आशय यह कि, जब वह गलीमें
आते हैं तब तो सूधे नेत्र मन्दिरके सन्मुख लगे रहते हैं और
जब मंदिरसे आगे चलते हैं तब मंदिरकी ओर होजाते हैं ।
हेतु अलंकार ॥ ३४३ ॥
स्वप्नदर्शन ।
देख्यो जागत वैसिये, सांकर लगी कपाट ।
कित ह्वै आवत जातभाजि, को जाने केहि बाट ३४४