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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 151

( ९८ ) सत्सई-सटीक ।
उरउरझो चितचोरसों, गुरुगुरुजनकी लाज ॥
चढ़े हिंडोरेसे हिये, किये बनै गृहकाज ॥२८७॥
मनतौ चित्तचोरसे उलझ रहा है उधर गुरुजनोंकी लज्जा
है हिंडोलेसे हियेपर चढ़करभी बालाको घरका काम कियेही
बनता है आशय यह है कि, डांवाडोल मनसे घरका काम करै
है 'छेकानुप्रास' ॥ २८७ ॥
उनिहरकी हँसिकै उतै, इनसौंपी मुसिक्याय ॥
नैनमिलेमनमिलगयो, दोऊमिलवतगाय॥२८८॥
प्रीतमने हँसकर अपनी गौ प्यारीकी ओर हांकी प्यारीने
हँसकर प्यारेको सौंपी, नैन मिलतेही मन मिलगया, जिस
समय गाय मिलाई द्वितीय असंगति । हरकी-हांकी॥२८८॥
उनको हित उनहीं बनै, कोऊ करो अनेक ।
फिरतकाकगोलकभयो, दुहूँदेह ज्यौंएक ॥२८९॥
दोनोंका हित उन्हीं दोनोंसे बन आता है और कोई
कितनीही करो नहीं बनता दोनोंके शरीरमें एकही जीव कौ
एकी आंखके समान कभी इधर कभी उधर फिरता है
'दृष्टान्त' ॥ २८९ ॥
याके उर औरै कछू, लगी विरहकी लाय ।
पजरैनीर गुलाबके, पियकी बात बुझाय ॥२९०॥