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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

( १०६ ) सतसई सटीक ।
अर्थात् स्वर भंग हुआ और शब्द सुनाकर जो प्रीतम न ठहरे
इससे वैरी कहा। 'छेकानुप्रास' ॥ ३११ ॥
चितवन भौरे भायकी, गोरे मुख मुसक्यान ।
लगनि लटकिआली गरे,चितखटकतनितआन॥
उसका भोरे भायसे देखना, और गोरे मुखकी मुसकान
लगना लगाना लटकके सखीके गरे यह बात नित्य मेरे शरी-
रमें आनकर खटकती है। 'स्वभावोक्ति' ॥ ३१२ ॥
क्षण क्षणमें खटकत सुहिय, खरी भीरमें जात ।
कही जु चलि बिनही चितै, ओठनहीमें बात ३१३
क्षण क्षणमें वह बाला मेरे मनमें खटकती है, बड़ी भीरमें
जाते हुए वह देखकरहोठोंहीमें बातकहकर चली।'स्मृति' १३३
चिलक चिकनई चटकसों,लफति सटकलोंआय।
नारि सलोनी साँवरी, नागिनलों डसिजाय॥ ३१४
चसक चिकनाईकी चटकसे लचकती हुई पतली छड़ीके
समान आकर वह सांवरी सलोनी बाला नागिनिके समान
डस जाती है; आशय यह कि, प्रिया विना मन व्यग्र है।
'पूर्णोपमा' ॥ ३१४ ॥
डग कुडगतिसी चलि ठठक,चितई चली निहारि।
लियेजात चित चोरटी, वहै गोरटी नारि ॥३१५॥