बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०४ ) सतसई-सटीक ।
हे कृष्ण ! (वह विरहनी तुम्हारे अनुरागमें) तुम्हारे मिल-
नेकी कामनासे सुखको होमती है प्रीतिकी आगकी लपटमें
मैने उसे ज्वालामुखीके समान जलते देखाहै अथवा लगन-
रूपी अग्निकी ज्वाला ज्वालामुखीसी जलती है, 'सविषय-
सावयव' ॥ ३०५ ॥
थाकी यतन अनेक करि, नेक न छाँडति गैल ।
करी खरी दुबरी सुलगि, तेरी चाहचुरैल ॥ ३०६ ॥
हम अनेक यत्न करके थकगईं, परन्तु वह नेकभी
पीछा नहीं छोडती तुम्हारी चाहरूप चुडेलने चिपटकर उसे
अति दुर्बल करदिया है ॥ ३०६ ॥
लाल तिहारे विरहकी, आगिनि अनूप अपार ।
सरसै बरसै नीरहूं, झरसे मिटै न झार ॥ ३०७ ॥
हे लाल ! तुम्हारे विरहकी अग्नि अनूप और अपार है बर-
से पानीकी भांति बढती है और झडसे लपटभी नहीं मिटती
अद्भुत रसमें विरहनिवेदन है 'पंचम विभावना' ॥ ३०७ ॥
जो वाके तनुकी दशा, देखो चाहत आप ।
तो चलि नेकविलोकिये, चलिऔचक चुपचाप ॥