बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११६ ) सतसई-सटीक ।
जागतेहुए देखा कि, किवाँड़में वैसीही साकर लगी है
कौन जाने किधर होकर आते हैं और किस मार्गसे भगजा-
तेंहैं । विभावना ॥ ३४४ ॥
सुखसों बीती सब निशा, मनु सोये इकसाथ ।
मूकामेलि गह्योजु छिन, हाथ न छोड़त हाथ ३४५
सारी रात सुखसे बीती मानो एकसाथही सोये हैं मूके में
डालकर हाथ जो पकड़ा सो एक क्षणमात्रको भी नहीं छोड़ा
मूका-मोखा भट्ठा अथवा स्वम उनको देखतेमें सुखसे सब
रात बीती मानों एक साथही सोये हैं अपने हाथसेही जो
अपना हाथ पकड़ा उसे उनका जानकर एक क्षणमात्र को न
छोड़ा । उत्प्रेक्षा ॥ ३४५ ॥
दुचितैचितहलतिन चलति, हँसतिनझुकतिविचारि
लिखितचित्र पियलखिचितै, रही चित्रलों नारि॥
चित्त दुचिताईमें होरहा है न हलती है न चलती है न
हँसती है न विचारकर क्रोध करती है प्रीतमको चित्र लिख-
ता देख प्यारी स्वयं चित्रके समान होगई दुचितै मन इस
कारण है कि,मेरी मूर्ति लिखै हैं वा अन्यकी हलने चलनेकी
आहट होगी इसकारण नहीं हिलती अपनीही है यह निश्चय
न होनेसे हँसती नहीं, और दूसरीकी कदाचित् न हो यही
विचार क्रोध नहीं करती । संशयालंकार ॥ ३४६ ॥