बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थशतक ४. (१०५)
हे कृष्ण ! जो उसके शरीरकी दशा आप देखना चाहते
हो तो चुपचाप औचक चलकर देखिये [ बलि-बलिहारी
जाऊँ ] काव्यलिंग संभावना । आशय यह कि, तुम्हें देख
मोटी होजायगी ॥ ३०८ ॥
लई सौंहसी सुननकी, तजि मुरली धुनि आन ।
कियेरहतनितरातदिन, कानन लागे कान ३०९॥
वंशीकी टेर सुनकर मानों और बातके सुननेकी इसने सौ-
गंधसी खारक्खी है रात दिन वंशीका ध्यान वनकी ओर का-
न लगाये किये रहते हैं । 'उत्प्रेक्षा' ॥ ३०९ ॥
उर लीने अति चटपटी, सुनिमुरलीधुनिधाय ।
हों हुलसी निकसीसुतौ, गो हुलसी हिय लाय ३१०
मुरलीकी ध्वनि सुन हृदयमें अति चटपटी लिये धाव-
मान हुई ज्यों मैं प्रसन्न हो बहर निकली सो वह मगन ह्वै
मेरी छातीमें हुलसी लगाकर गये । 'यमकालंकार' ॥३१०॥
सुनति न ताल रुतानकी, उठै न सुर ढहगाय ।
एरी राग विगारिगो, वैरी वोल सुनाय ॥ ३११ ॥
तालके स्वरकी सुरत नहीं सुर ठहरके नहीं उठता, एरी
सखी वह वैरी अपना बोल सुनाकर मेरा राग बिगाड़गया;