बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(११०) सतसई-सटीक।
पियमन रुचि हैबो कठिन, रुचि न होत शृंगार।
लाख करो आँखि न बढ़े, बढ़े बढ़ाये बार॥३२५॥
प्रीतमके मनमें रुचि होनी कठिन है; शृंगारको रुचि नहीं
होती. लाख करो आंखिनहीं बढ़ेगी, बढ़ानेसे विलम्ब बढ़ेगा।
अभिसारके निमित्त देर होतेमें सखी वचन अथवा लाख यत्न
करो बढ़ायेसे आंख नहीं बढ़ती परन्तु विलम्ब बढ़ताहै-आशय
यह कि, बाला सौतनको शृंगार करते देख मनमें विचारने लगी
कि, प्रीतमका मन इससे न लगजाय उसपर सखीने सावधान
किया। 'दृष्टान्तालंकार'॥ ३२५ ॥
जालरंध्र मग अगनिको, कछु उजाससों पाय।
पीठ दिये जगसों रहै, दीठि झरोखा लाय॥३२६॥
झरोखोंके छिद्रोंके मार्गमें कुछ उजालासा पाकर झरोखेमें
दृष्टि लगाय जगके लोगोंसे मुख फेरे रहतीहै; आशय यह कि,
सबसे मुख फेर आपहीके देखनेकी अभिलाषा कियेरहती है।
'परिसंख्या'॥ ३२६॥
यद्यपि सुन्दर सुघर पुनि, सगुनो दीपकदेह।
तऊ प्रकाश करै तितो, भरिये जितो सनेह ३२७
प्रीति बढ़नेका कारण सुन्दर घर (घट) गुणसहित है
और दीपकसी देह है तौभी उतनाही प्रकाश करताहै जितना