बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थशतक ४. (१०७)
डग मग पैरसे डिगती हुई एक पग चलकर ठिठकगई और
फिर मेरी ओर देखा, वह चोटी गोरी नारी मेरा चित्त चुराये
लिये जातीहै। 'स्वभावोक्ति' अथवा ठिठकती हुई थान छू-
कर चली आधी चितवनसे देखा, इत्यादि ॥३१५॥
भौंह ऊँचे आँचर उलटि, मोरि मोरि मुख मोर ।
नीठ नीठ भीतर गई, दीठि दीठिसों जोर ॥३१६॥
भौंहकी चेष्टा ऊँची कर आँचरको उलट ऐंडाय जँभाय-
कर वा घूमकर-किसी भांति दृष्टिसे दृष्टि जोरकर भीतरको
गई। 'स्वभावोक्ति' ॥ ३१६ ॥
रहो मोह मिलनी रहो, यों कहि गहो मरोर ।
उत दै सखिहि उराहनो, इत चितई मो ओर ३१७
अब हमारी तुम्हारी प्रीति और मिलना हो चुका, यों क-
हकर मरोर की; उधर सखीको उरहना दिया और इधर मेरी
ओर देखा । 'गूढोक्ति' ॥ ३१७ ॥
चुनरी श्याम सुतार नभ, मुखशशिकी अनुहारि ।
नेह दवावत नींदलों, निरखि निसानी नारि ३१८॥
. रात्रि और बालाका रूपक, काली चुनरी श्वेत चित्तीवालीही
मानों तारोंसहित आकाश है, मुख चन्द्रमाके समान है, जिसमें