बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०८ ) सतसई-सटीक ।
उस ( निसानी ) रात्रिके समान स्त्रीको देखा है तबसे नींदके
समान उसकी प्रीति मुझे अचेत करती है । 'रूपक'॥३१८॥
फेर कछूकरि पौरते, फिरि चितई मुसक्याय ।
आई जामन लेनको, नेहै चली जमाय ॥ ३१९ ॥
फिर कछ करके उसने पौरीसे लौट पीछे फिर मुसकाकर
देखा जामन लेनेको आईथी पर प्रीतिको जमाचली। असंगति
और 'पर्यायोक्ति' ॥ ३१९ ॥
देह लगी ढिग गेहपति, तऊ नेह निरवाहि ।
ढीली अँखियनही इतै, गई कनखियन चाहि ३२०
मेरे शरीरसे लगा हुआ उसका पति मेरे निकट था, तौ
भी वह अपनी प्रीति निबाह गई, अर्थात् ढीली आँखोंसेही
कनखियोंद्वारा इधर देखगई । 'पंचमविभावना' ॥ ३२० ॥
लहि सूने घर कर गहो, दिखा दिखीकी ईंठि ।
गड़ी सुचित नाहीं करत, कर ललचोंही दीठि ३२१
सूना घर देखकर मेरा हाथ पकड़ लिया, देखा देखीका
इष्टकर हाथ पकड़नेपर वह नहीं करती है और लालच भरी
दृष्टि करके चित्तमें गड़ी है ॥ ३२१ ॥
कालबूत दूती बिना, जुरै न और उपाय ।
फिर ताके तारे बनै, पाके प्रेम लदाय ॥ ३२२ ॥