बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(११२) सतसई-सटीक ।
नागरि विविध विलास तजि, बसी ग्वेलन माँहि।
मूढोंमें गनिबो करै, हूठो द अठिलाहि ॥३३१॥
हेनागरि ! तू अनेक विलास त्यागन कर गँवारियोंमें आन-
कर बसी है यह तुझे मूर्खोंमें गिनकर धक्का दे इठलाती है।
'पर्यायोक्ति' प्रिया मानकर गँवारियोंमें जाबैठी वहां सखीने
कहा ॥ ३३१ ॥
रही लटू है लालहों, लखिबो बाल अनूप ।
कितो मिठास दियो दई,इते सलौने रूप ॥३३२॥
हेलाल ! मैंभी तो उसका अनूपरूप देखकर लट्टू
होगई, विधाताने उसके सलौने रूपमें कितना मिठास दिया
है। 'विरोधाभास' ॥ ३३२ ॥
तीजपरब सौतिन सजै, भूषण वसन शरीर ।
सबै मरगजे मुखकरी,वही मरगजे चीर ॥३३३॥
सावनकी तीजके त्यौहारमें सौतोंने शरीरपर भूषण वस्त्र
सजाये, परन्तु प्यारीने उसी मिलगिजे वस्त्रसे सबका मुख
मर्दित करदिया, अर्थात् जो बात और शृंगार करके नहीं
प्राप्त करसकती, वह यह मिलगिजे वस्त्रसे करती है ॥३३३॥
सोहत धोती श्वेतमें, कनकवरण तनु बाल ।
शारदवारद बीजरी, भारद कीजतु लाल॥३३४॥