बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०० ) सतसई-सटीक ।
रावणके यहां जानकी जैसे रामका ध्यान करतीथीं इसी
प्रकार लाजके वश यहभी तुम्हाराही ध्यान करती है, सो
चलकर देखो 'पूर्णोपमालंकार' ॥ २९२ ॥
नैकु नझुरसी विरह झर, नेहलता कुँभिलाति ।
नित नित होत हरीहरी, खरी झालरति जाति २९३
विरहाग्निकी लपटसे झुलसकै प्रेमकी लता कुछभी नहीं
कुँभलाती, प्रतिदिन हरी भरी हुई बढती जाती है, झालरति
बढती है 'विशेषोक्ति' ॥ २९३ ॥
खल बढई बलकरिथके, कटै न कुवत कुठार ।
आल वाल उरझालरी, खरी प्रेम तरुडार ॥२९४॥
हे सखी दुष्टरूप बढई बलकर हारगये उनके कुवचन
रूपी कुल्हाडेसे नहीं कटता, थांवलेरूपी हृदयमें प्रेमवृक्षकी
डाल बढतीही जाती है 'रूपक विशेषोक्ति' ॥ २९४ ॥
करत जात जेती कठिन, बढिरस सरिता सोत ।
आलवाल उर प्रेमतरु, तितौ तितौ दृढहोत २९५
रसरूपी नदीका सोता बढकर जितनी काट करता जाता
है, थाबलेरूप हृदयमें प्रेमका वृक्ष उतना उतनाहीं दृढ
होता जाता है कटन-किनारेका काटना 'विरोधाभास' २९५॥