बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयशतक ३. ( १०१ )
बाल वेलि सूखी सुखद, इहि रूखे रुख घाम ।
फेरि डहडही कीजिये,सुरस सींचि घनश्याम ॥
बेलीके समान वह सुखदायक बाला तुम्हारे रूखे पन-
की धूपसे सूखगई हे हे घनश्याम अब उसे सुरससे सींचकर
हरी कीजिये घाम-धूप। घनश्याम-कृष्ण या मेघ।रस-जल-
और प्रीति। 'परिकरांकुर' ॥ २९६ ॥
देखत ह्वै कपूरलौं, उडैजाय जिनलाल ।
छिन छिन जातपरीखरी, छीन छवीलीवाल २९७
हेलाल वह छवीली क्षणक्षणमें क्षीण पड़ती जातीहै, देखते
देखते न्यून हुई जातीहै, कहीं कपूरके समान उड़नजाय
विरह निवेदन 'पूर्णोपमा वीप्सा' ॥ २९७ ॥
कहा कहौं वाकी दशा, हरि प्राणनके ईश ।
विरहज्वाल जरबो लखै, मरिबोभयोअशीश२९८
हे प्राणेश्वरहरि ! में उसकी दशा क्याकहूँ विरह
अग्निमें जलना हुआ देख उसके लिये मरनाही आशीर्वादहै
'लेशाऽलंकार' ॥ २९८ ॥
हरि हरि वरि वरि करि उठति, करि थकी उपाय।
वाको ज्वर बलि वैद ज्यौं, तोरसजायनोजाय२९९