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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

चतुर्थस्तवक ४. ( ११३ )
हेलाल ! श्वेतधोतीमें उस बालाका सुवर्णके समान शरीर
शोभायमान होता हुआ शरद् ऋतुके मेघोंमें बिजुलीकी
शोभाको मात करताहै । प्रतीप और वृत्त्यनुप्रास ॥३३४॥
हों रीझी लखि रीझिहो, छविहि छबीले लाल ।
सोनजुहीसीहोतिद्युति,मिलत मालतीमाल ३३५
मैं तो रीझीहूं और तुमभी उसकी छविको देखकर रीझोगे
हे छबीले लाल ! चमेलीकी माला पहननेसे उसकी शोभा
सोनजुहीसी होतीहै । तद्गुणालंकार ॥ ३३५ ॥
क्षणक छबीले लाल वह, ज्यौँलगि नहिं बतराय ।
ऊप मयूख पियूषकी,तौलगि भूख न जाय ३३६
हे छबीले कृष्ण ! एक क्षणको जब तक वह नहीं बोलती
तब तक गन्ना, मधु, और अमृतरसकी भूख नहीं जाती ।
वृत्त्यनुप्रास ॥ ३३६ ॥
टोरी लाई सुननकी, कहि गोरी मुसकात ।
थोरी थोरी सकुचसों, भोरी भोरी बात ॥३३७॥
मुग्धाकी बात सुननेकी रट लगाई प्रीतम मुसकराता है
और गोरी बाला थोरी थोरी सकुचमें भोरी भोरी बात
कहती है । छेकानुप्रास और वीप्सा ॥ ३३७ ॥