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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 167

( ११४ ) सतसई-सटीक ।
नेको उहि न जुदी करी, हरष जु दी तुम माल।
उरते वास छुटो नहीं, वास छुटेहूं लाल ॥ ३३८॥
जो माला तुमने प्रसन्न होकर उसे दी उसे उसने क्षणमात्र
कोभी हृदयसे अलग न किया, हे लाल ! उसकी सुगंधि
जातीरही परन्तु हृदयसे उसका वास न छूटा। यमक॥३३८॥
मोहिं भरोसो रीझिहैं, उझक झांकि इकबार ।
रूप रिझावनहार यह, ये नैना रिझवार ॥३३९॥
मुझे भरोसा है कि, तू एकहीबार उझककर झाँकेगी
तो रीझैगी अर्थात् एकबार तू खिडकीमें झांककर तो देख
उनका रूप रिझानेवाला है, और तेरे नेत्र रीझनेवाले हैं।
समालंकार ॥ ३३९ ॥
ल्याई लाल विलोकिये, जियकी जीवनमूल ।
रही भौनके कोनमें, सोनजुहीसी फूल ॥३४०॥
हे कृष्ण ! मैं लेआईहूं चलकर अपनी जीवनमूलको
देखिये वह भवनके कोनेमें सोनजुहीसी फूल रही है।
उपमा ॥ ३४० ॥
नहिं हरिलों हियरा धरो, नहिं हरलों अरधंग ।
एकतहीं करि राखिये, अंग अंग प्रतिअंग ३४१॥