बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयशतक ३. (९७)
बालक लेनेके बहाने वह छैल ढीट मेरे निकट आकर
अचानक मेरी छातीमें अपनी अंगुरी छुवाय गया 'पर्यायोक्ति'
नई लगन कुलकी सकुच, विकलभई अकुलाय ।
दुहूँओरऐंचीफिरै, फिर कीलौं दिनजाय ॥२८४॥
नई प्रीति और कुलकी सकुचसे घबराकर व्याकुलहो
दोनों ओर खिचीहुई फिरकीके समान फिरती है, इधर
उधरकी खिचावटमेंही दिन जाता है, कभी प्रीतमका ध्यान
कभी घरका संकोच 'उपमेयलुप्त' परकीयामध्यानायिका २८४
झटकि चढ़ति उतरति अटा, नैकनथाकतिदेह ।
भई रहत नटको बटा, अटकी नागरिनेह॥२८५॥
झट चढ़ती है, और झट अटारीसे उतरती है, देह थकता
नहीं है वह नागरी (चतुर) नेह लगनेके कारण नटका चट्ट
वट्ठाहुई रहती है 'विशेषोक्ति रूपक' ॥ २८५ ॥
इतते उत उतते इतै, क्षण न कहुँ ठहराति ।
कलनपरति चकई भई, फिरि आवति फिरि जाति॥
इधरसे उधर उधरसे इधर फिरती है क्षणभर कहीं नहीं
ठहरती कलनहीं पड़ती चकईके समान प्रीतमके देखनेको
फिर २ आती और जाती है 'उपमेयवाचक लुप्तोपमा' २८६