बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०२ ) सतसई-सटीक ।
हे प्रीतम वियोगमें वह हरिहारि बलि अर्थात् जली २ कह
उठती है,हम उपायकर हारगईं उसकी ताप बली बैदकी भाँ-
ति तुम्हारे रस (प्रेमभरे वाक्य पक्षान्तरमें फुंकीधातु) से जा-
य तो जाय 'वृत्यनुप्रास और श्लेष' ॥ २९९ ॥
यह विनशत नगराखिकै, जगत बडो यशलेहु ।
जरीविषमज्वर जाय यह,आय सुदर्शन देहु ३००
यह स्त्रीरूपी रत्न नाश होताहुआ रखकर जगत्में यशलो
वियोगरूपी विषमज्वरसे जली जाती है, आनकर अपना
सुन्दर दर्शन दीजिये, सुदर्शन चूर्णभी विषमज्वरपर प्रसिद्ध
है, सो दर्शनरूपी चूर्ण माँगती है 'श्लेषालंकार' ॥ ३०० ॥
विहारीकी सतसईमें पण्डित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकासहि-
त तीसरा शतक पूर्ण हुआ ३ शुभमस्तु ।
नैक न जानी परत यों, परो विरह तनु छाम ।
उठति दियालौं बाढि हरि,लिये तुम्हारो नाम ॥
वह कुछ भी जानी नहीं जाती विरहसे शरीर उसका
क्षीण होगया है परन्तु तुम्हारे नाम लेनेसे दियेके समान
चैतन्य हो उठती है । 'उपमालंकार' ॥ ३०१ ॥
मैं ले दयो लयो सुकर, छुवति छनकिगो नीर ।
लाल तिहारो अरगजा,उरलगि भयो अबीर ३०२