बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थशतक ४. (१०३)
मैने जो तुमसे लेकर प्रियाको दिया सो उसने सुन्दर
हाथमें ग्रहणकिया, उसके हाथमें छूतेही पानी जलगया हे
लाल! तुम्हारा दिया अरगजा उसके हृदयमें लगकर अङ्गार
होगया पानी सूखकर श्वेतता होगई विरह वर्णन। "अयुक्ता-
लंकार" ॥ ३०२ ॥
हितकरितुमपठयोलगै, वा विजनाकी बाय ।
टरी तपन तनुकी तऊ, चली पसीना न्हाय ॥ ३०३ ॥
तुमने जो प्रेमकर पंखा भेजा उसकी पवन लगनेसे शरी-
रकी गरमी तो गई परन्तु पसीनेमें न्हागई सात्त्विकभाव प्रगट
होनेसे पसीना आया । 'पंचम विभावना' ॥ ३०३ ॥
हँसि उतार हियते दई, तुम जो तादिन लाल ।
राखत प्राण कपूरलों, वहै गुंजकी माल ॥ ३०४ ॥
आपने जो हँसकर उस दिन हृदयसे उतारकर माला दी
हे हे कृष्ण ! वही घोंटलीकी माला उसके प्राणोंको कपूरकी
भाँति रक्षा करती है कपूरमें घों