बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयशतक ३. ( ९९ )
इसके हियेमें औरही कुछ विरहकी बुरी आग लगी है
गुलाबका जल छिड़कनेसे बलती है और प्रीतमकी बात
करनेसे बुझती है प्रोषितपतिका आग पानीसे बुझती है
परन्तु विरहाग्नि पानीसे बढी. बात-हवासे अग्नि बढती है
यहां बात वार्त्तासे बुझी यह विरुद्धते कार्य हुआ 'विभावना
लंकार' ॥ २९० ॥
तियनियहियजुलगी चलत,पिय नखरेख खरोट।
सूखनदेत न सरसई,खोंटिखोंटिखतखोट २९१॥
चलते हुए प्यारीके हृदयमें जो प्रीतमके नखके खरोंट-
की रेखा लगी है, सो उस क्षतके अंकुरको नखसे कुरेद २
कर उसका गीलापन नहीं सूखने देता यही खोट है. याद
रखनेके निमित्त उपाय है 'अनुज्ञा' ॥ २९१ ॥
बसि सङ्कोचवश रावनवश, साच दिखावति बाल ।
सियलौं शोधतितियतनुहिं,लगनि अगनिकी ज्वाल
प्यारी रावणरूपी लाजके वशमें रहकरभी अपना सत दिखा-
ती है, और शरीरको लगनरूपी अग्निकी लपटमें सीताजीकी
समान शुद्ध करती है अर्थात जैसे रावणके वशमें
आनकर जानकीने अग्निमें अपना शरीर शोधा था, उसी
प्रकार प्यारीभी अब लाज छोड़ संकेतमें आई है, और तुम्हें
सत दिखानेको उत्सुक है इसमें है लाज रूपी रावण, और