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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

( ८४ ) सतसई-सटीक ।
एक क्षणको चलती है फिर क्षणमात्रको ठठकती है प्रीत-
मके गलेमें बांहडाले बिजलीकी छटासी वह बाला अटारी
पर चढी घटा देखती है, ‘धर्मलुप्तोपमा’ ॥ २४४ ॥
राधा हरि हरि राधिका, बनिआये संकेत ।
दम्पतिरतिविपरीतसुख, सहजसुरतहूलेत॥२४५॥
राधा कृष्ण बनी और कृष्ण राधा बनकर संकेत (मिला-
पस्थान ) में आये वह दोनों प्रियाप्रीत सहज सुरतमें
ही विपरीत रतिकी सुखलेते हैं, ‘काव्यलिंग.’ इसी शोभाको
मेरे पितृव्य कविवर झब्बीलालने यौं लिखा है कि, पद- यह
जोडी मेरे मनभाई है, गोरेलाल चंद्र सम सोहैं राधेश्याम
अधिकमनमोहैं मानोधटामिलनशशि आईहै ॥१॥ मृदुमुसका
नभरी टौनेकी, भाल बंधी बंदी सोनेकी, सखि दामिनिसी
दमकाई है ॥ २ ॥ शिर मोरन चंद्रिका सुहाई, घटा निरख
बोले मोर आई, जो लालने बंसी बजाई है ॥ ३ ॥ मुक्तमाल
कुचबिच लटकी है । तामें यह शोभा अटकी है । जनु गिरि
बिच नदी बहाई है ॥ ४ ॥ शिर मोतिनकी माँग विराजै ।
ताकी छवि वर्णत कवि लाजै । मनुबक पंक्ति बैठाई है ॥५॥
जबराधे इतउत कहुं डोलैं, नूपुर ऐसी बोली बोलैं । मानो
दादुर झिंगर झरलाई है ॥६॥ बोलत राधे अति प्रिय वानी ।
सों वानी मोहि अति हि सुहानी । मनो कोयल कूक सुनाई

तृतीयशतक ३. ( ८५ )
है ॥ ७ ॥ स्वांतिबूँद पिया दर्शन तेरो । प्रेम सखीको मन
चातक चेरो। तेरे नामकी रटन लगाई है ॥ ८ ॥
चलत घरै घर घरतऊ, घरी न घर ठहराति ।
समुझिउहीघरकोचलै, भूलिउहीघरजाति २४६॥
अपने घरकी कोठरी कोठरीमें घूमती है, तौभी घरमें
घड़ीभर नहीं ठहरती जानकरभी उसी घरको जाती है.
भूलकरभी उसी घरको जातीहै. अथवा समझ उही-परघरकी
उस दुर्नामताको समझकर घरको चलती है और फिर
प्रेमके कारण निन्दाको भूल कृष्णकेही स्थानको चली
आती है 'भ्रांति' ॥ २४६ ॥
नाहिं नहीं नाहींककै, नारि निहोरै लेय ।
छुवतओठविचआँगुरिन,बिरीवदनप्यौँदेय २४७
नहीं नहीं कर प्यारी निहोरैसे लेती है, प्यारे पानकी
बीड़ी देते समय होंठोंको अंगुरियोंसे छू देते हैं 'कुट्टामित
हाव, स्वभावोक्ति' ॥ २४७ ॥
गदराने तन गोरटी, ऐपन आड लिलार ।
हृस्यौँदैअठलायदृग, करै गँवारि सुमार ॥२४८॥
गदराने शरीरकी गोरी बाला माथेपर ऐपनकी आड लगाये

( ८६ ) सतसई-सटीक ।
अठखेलीसे आंखका धक्का दे गँवारी मुझे विद्ध किये देती है
'मदहाव' 'जाति' अलंकार ॥ २४८ ॥
जात मरी बिछुरत घरी, जल सफरीकी रीति ।
क्षणक्षण होत खरी खरी,अरी जरी यह प्रीति २४९
एकघरी भी जलसे बिछुरे तो मरजाती है यह मच्छरीकी
रीति है,परन्तु हे सखी! यह हमारी जली प्रीति तो पलपलमें
अधिक होती है आशय यह,मच्छरी तो मरकर दुःखसे छूटती
है और मैं तो क्षणक्षण अधिक दुःखपाती हूं वा वियोगमें प्रीति
बढती है तपनहाव वर्णन किया ॥ २४९ ॥
द्वैजसुधादीधितिकला, यह लखि दीठि लगाय ।
मनो अकास अगस्तिया,एकै कली लखाय २५०
दोयजके चन्द्रमाकी अमृत भरी कलाको जान दृष्टि
लगाकर देख, जैसे आकाशरूपी अगस्तके वृक्षमें एकही
कली दिखाई दे रही है [ दीधिति चन्द्रमा ] । 'मुग्धाहाव
पर्यायोक्ति और उत्प्रेक्षालंकार' ॥ २५० ॥
मोट्टायितहाववर्णन ।
सकुचिसरकिपिय निकटतें,मुलकिकछुकतनतोरि
करआँचरकी ओटकर,जमुहानी मुख मोरि २५१

तृतीयशतक ३. (८७)
सकुचकर प्रीतमके पाससे सरक मुसकुराकर प्यारीने
अँगडाई ले हाथसे आँचरकी ओटकर मुख मोर जँभाई ली
आशय यह कि, संभोगकी इच्छा की । 'स्वभावोक्ति'२५१॥
बेंदी भाल तंबोल मुख, सीस सिलसिलेवार ।
दृग आँजे राजै खरी, यही सहज शृँगार ॥ २५२ ॥
माथेपर बेंदी, मुखमें पान, शिरके चिकने बाल, आंखोंमें
काजर दिये इस सहज शृंगारसेही अच्छी शोभा पारही है ।
जाति अलंकार, विक्षिप्तहाव ॥ २५२ ॥
बिब्बोकहाव (प्रियांका विलास)
बिधिविधिकै निकरै टरै, नहीं परेहू पान ।
चितै कितै तैंलैं धरयो, इतौ इते तन मान॥२५३॥
भांति भांतिसे प्रीतमने तेरा मान मनाया, पांवभी पड़े
परन्तु नहीं गया, देख तो इतने छोटे शरीरमें इतना बड़ा
मान तैने कहां रखरा है । अधिक ॥ २५३ ॥
ललित हाववर्णन ।
बतरस लालच लालकी, मुरलीधरी लुकाय ।
सौंहकरै भौंहनि हँस, दैन कहै नटि जाय॥२५४॥
बातोंके रसस्वादके लालची लाल की मुरली प्यारीने

( ८८ ) सतसई-सटीक ।
छिपाराखी, सौगंध खाया, भौंहोंमें हँसे देनेको कहै और
फिर मुकर जाती है। पर्याय० स्वभावोक्ति ॥ २५४ ॥
विक्षेपहाव ।
गुडी उडी लखि लालकी, अँगना अँगना मांहि ।
बौरीलों दौरतिफिरै, छुवत छबीली छांहि॥२५५॥
प्रीतमकी गुड्डी ( कनकैया ) उडी देख वह बाला अपने
आँगन २ में बौरीहुईसी दौडती फिरती है और पतंगकी
छांहको छूतीहै। छेकानुप्रास पूर्णोपमा ॥ २५५ ॥
बोधकहाववर्णन ।
लखि गुरुजन बिच कमलसों, सीस छुवायोश्याम
हरिसन्मुख करि आरसी, हिये लगाई वाम२५६
गुरुजनोंके मध्यमें प्यारीको देख कृष्णने कमलको
शिरसे छुवाया, और प्यारीने आरसी कृष्णके सन्मुखकर
हृदयसे लगाई अर्थात् कृष्णने शिरपर कमल धर प्रणाम
किया. प्यारीने आरसी दिखाय हिय लगाय रातमें मिलनेको
कहा। सूक्ष्मालंकार ॥ २५६ ॥
मैंहू जान्यो लोचननि, जुरत बाढिहै जोति ।
कोहो जानत दीठिकों,दीठिकिरकिटीहोति २५७
हे सखी! मैंने जानीही कि आंखोंके मिलतेही आंखोंमें जो-
ति बढैगी,यह मैंने नहीं जाना कि,दृष्टि लगनेसे दृष्टि किरकिटी

तृतीयशतक ३. (८९)
होती है आशय यह कि, देखतेही सात्त्विक हुआ और आं-
सूभर कर दृष्टि किरकिरी होगई । विषमालंकार ॥ २५७ ॥
हरिछवि जल जबतें परे, तबतें क्षणनिवरैन ।
भरत ढरत ऊडत तरत, रहत घरीलों नैन ॥२५८॥
कृष्णकी छविरूप जलमें जबसे पड़ेहैं, तबसे क्षणमा-
त्रको निचिन्त नहीं हैं, भरते हैं, ढरकते हैं, मग्न होते हैं,
तिरते हैं, कटोरेकी घड़ीकी समान नेत्रोंकी दशा है । उप-
मालंकार ॥ २५८ ॥
अलि इन लोयनको कछू, उपजी बडी बलाय ।
नीरभरे नित प्रति रहें, तऊन प्यास बुझाय २५९॥
हे सखी ! इन नेत्रोंको कोई बड़ा रोग उपजाहै, इनमें नित
जल भरा रहता है, तथापि ( प्रीतमदर्शनकी ) प्यास नहीं
जाती, विनादेखे जल भरे, देखनेसे तृष्णा नहीं मिटती । वि-
शेषोक्ति ॥ ५९ ॥
अलि इनलोयनशरनिको, खरो विषम संचार ।
लगे लगाये एकसे, दुहवन करत सुमार ॥ २६० ॥
हे सखी ! इन नैनारूपी बानकी कठिन गति है, यह लगे
लगाये एकसे हैं और लगानेसे दोनोंको मूर्छित करते हैं
असंगति ॥ ६० ॥

(९०) सतसई-सटीक ।
लोभ लगे हरि रूपके, करी सांट जुरिजाय ।
होयनबेचीबीचही, लोयन बडी बलाय ॥ २६१ ॥
सट्टेकी गोष्ठीमें परस्पर मिलकर कृष्णके रूपके लोभमें
लगगये यह मेरे नेत्र बड़ी बलाय हैं, इन्होंने मुझे बीचहीमें
बेच दिया आशय यह कि, प्यारी प्रीतमके पास जातीथी अचा-
नक वे मार्गमें मिलगये तो नेत्र लगजानेसे मन उनके आधीन
होगया इस कारण सखीसे कहा कि, मैं वहाँतक पहुंची भी
नहीं और इन्होंने सट्टाकर प्रीतमका रूप पानकर बदलेमें मुझे
सेतमेत देदिया रूपक ॥ २६१ ॥
नैना नैकन मानहीं, कितौ कह्यो समुझाय ।
तन मन हारेहू हँसे, तिनसों कहा बसाय ॥ २६२ ॥
यह नेत्र मेरी एक नहीं मानते मैंने इन्हे कितनाही सम-
झाकर कहा यह शरीर और मन हारनेसे भी हँसतेहैं इनसे
क्या बसाय । विशेषोक्ति ॥ २६२ ॥
ढरे ढार तेही ढरत, दूजे ढार ढरैन ।
क्याहूं आनन आनसों, नैना लागत नैन ॥ २६३ ॥
हे सखी ! यह जिस ओर ढरगये उसी ओरको ढरगये
दूसरी ओर नहीं ढरते यह हमारी आंखें किसी प्रकार भी

तृतीयशतक ३. (९१)
( आन ) दूसरेके मुखकी ओर लगतीही नहीं ऐसी आसक्त
है । छेकानुप्रास ॥ २६३ ॥
कहत सकल कविकमलसे, मो मत नैन पषान ।
नतरुकुकत इनघिसिलगत,उपजत विरहकृशान॥
सम्पूर्ण कवि नेत्रोंको कमलसे कहतेंहैं परन्तु मेरे मतमें ने-
त्र पत्थर हैं नहीं तो जब यह परस्पर चारहोकर मिलतेहैं तो इ
नकी रगड़से अग्नि क्यों उत्पन्न होतीहै कमलकी रगड़से आग
उत्पन्न नहीं होती । हेतूत्प्रेक्षा ॥ २६४ ॥
साजे मोहन मोहकों, मोही करत कुचैन ।
कहाकरों उलटे परें, टोनै लौने नैन ॥ २६५ ॥
यह मैंने ( अंजन लगाय ) कृष्णके मोहनेको सजाये
परन्तु यह मुझेही मोहित करते हैं क्याकरूं इन नेत्ररूप
जादूगरका जादू उलटा मेरेही ऊपर पड़ा। विषमालं-
कार ॥ २६५ ॥
मोहूसों तजि मोह दृग,चले लागि उहिँगैल ।
क्षणक छाय छविगुर् डरी,छलेछबीले छैल २६६
मेरी आंखें मुझसे भी मोह छोड़ कर उनके पीछे हो उन्हीं-
की राहचलीं छिन एक छविरूपी गुड़की डली छुवायके
छबीले प्रीतमने मेरे नेत्र ठगलिये । रूपक ॥ २६६॥

(९२) सतसई-सटीक ।
नख सिख रूप भरे खरे, तउ मांगत मुसकान ।
तजत न लोचनलालची, ये ललचौहीं वान॥२६७॥
प्रीतमके नखसे सिखापर्यन्तके रूपमें अत्यन्त भर रहे
हैं, तथापि मुसकुरानदेखनेकी इच्छा करते हैं यह लाल-
ची अपने ललचानेका स्वभाव नहीं छोडते। विशेषोक्ति २६७
यश अपयश देखत नहीं, देखात सांवलगात ।
कहाकरौं लालचभरे, चपल नैन चलिजात॥२६८॥
सखी ! यह यश अपयशको तौ नहीं देखते केवल उनके स-
लौने शरीरको देखतेहैं क्या करूं यह लालचभरे चञ्चल नेत्र
उधरही चलजातेहैं अथवा आधेमें सखीने कहा तूं यश अपयश
नहीं देखती केवल सांवले गात देखती है इसपर आगे उत्तर है।
उत्तरालंकार ॥ २६८ ॥
लाज लगा मनमानहीं, नैनामो वसनाहिं ।
यह मुख जोरतुरंगलों, एचतहू चलिजाहिं २६९
यह नेत्र लज्जारूपी लगामको नहीं मानते, मेरे वशमें
नहीं और मुख जोर घोडेकी समान खैंचनेसेभी उसी ओर
चलेजातेहैं । उपमा और रूपक ॥ २६९ ॥
इनदुखिया अँखियानको, सुखसिरजोईनाहिं ।
देखतबनैन देखते, बिनदेखे अकुलाहिं ॥२७०॥

तृतीयशतक ३. (९३)
हे सखी इन दुखिया आँखोंको तो विधाताने सुख बना-
याही नहीं लोकोंके देखते लाजसे देखना नहीं बनता अथवा
देखतेसमय आंसू आनेसे नहीं देखाजाता और बिन देखे
अकुलाती हैं । विशेषोक्ति ॥ २७० ॥
को जानेहैहै कहां, जग उपजी अति आगि ।
मनलागे नैननि लगै, चलै न मगलग लागि २७१॥
सखी कौन जाने क्या होगा जगतमें अधिक आग उपजीहै
यह नेत्रोंमें लगतेही मनमें लगती है तू इसकारण इस (प्रेमकी
आगके ) निकट होकर मत चल । असंगति ॥ २७१ ॥
वनतनको निकसत लसत,हँसत हँसत इतआय ।
दृगखंजनि गहिलैगयो,चितवनिचपलगाय २७२
वनकी ओरको निकलते, शोभित होते हँसते हँसते इधर
आकर अपनी चितवनका चेप लगाकर मेरे नेत्ररूपी खंजन
( ममोले ) को पकड़कर लेगये । रूपकालंकार ॥ २७२ ॥
दृगउरझतटूटतकुटुमजुरतिचतुरसँगप्रीति ।
परतिगांठदुर्जनहिये, दईनई यहरीति ॥ २७३ ॥
नेत्रोंके उलझनेसे कुटुम्ब टूटताहै चतुरके संग प्रीति जु-
ड़ती है शत्रुके मनमें गांठ पड़ती है हे विधाता यह नई रीतिहै।
असंगति ॥ २७३ ॥

( ९४ ) सतसई-सटीक ।
है हिय रहति हईछई, नई युक्ति यह जोड़ ।
आँखिन आँख लगीरहै, देह दूबरी होइ ॥२७४॥
हाय हाय तेरे हृदयमें यह नई रीति छाई रहतीहै आं-
खोंसे आंखें लगी रहतीहैं और शरीर सूखताहै। असंगति २७४
क्योंवसिये क्यों निवजिये नीतिनेह पुरनाहिं ।
लगालगी लोयनकरैं, नाहक मन बँधजाहिं २७५
यहां कैसे वसै और कैसे निवाहहो प्रीति नगरमें न्याय न-
हीं होता लगालगी तौ नेत्र करते हैं, मन वृथा बँधजाता है।
असंगति ॥ २७५ ॥
जात सयान अयान ह्वै, वे ठग काहिठगैन ।
को ललचाय न लालके, लखिललचोहेनैन २७६
वहां सयाना भी अयाना होजाताहै वे नेत्ररूपी ठग किसे
नहीं ठगते, लालके ललचोहे नेत्र देखकर कौन न ललचावै।
व्याजस्तुति ॥ २७६ ॥
डर न टरै नींद न परैं, हरै न काल विपाक ।
क्षणछाकैकैउछकैनफिर, खरोविषमछविछाक २७७
डर दूर नहीं होता, नींद नहीं आती, कालकर्म भोगको हरण
नहीं करता, एकक्षण छककर फिर नहीं उछकता, छबिके मद-

तृतीयशतक ३. (९५)
से छकना विषमतेजहै, आशय यह कि, हे सखी! भयसे मदका
मद उतरजाताहै परन्तु रूपका मद नहीं उतरता, उसमें नींद
आती है पर इसमें नहीं, वह समयपर जाताहै यह नहीं, उस-
के पानेसे चेत होजाताहै इसरूपको क्षणमात्र पान करनेसे
फिर चेत नहीं होता, मदके मदसे रूपका मद बड़ाहै। आक्षिप्त
उपमामें व्यतिरेक ॥ २७७ ॥
चित वित वचत न हरत हठि, लालन दृगवर जोर।
सावधानके वटपरा, ये जागतकें चोर ॥ २७८ ॥
हे सखी मेरा चित्तरूपी धन नहीं बचता कृष्णके नेत्र
वरजोरीसे उसको हरे लेतेहैं, सावधानके वटमार और जागत
के चोरहैं [ वटमार-मार्ग्लुटेरे ] विभावना ॥ २७८ ॥
चखरुचिचूरन डारिकै, ठग लगाय निजसाथ ।
रह्यो राखिहठलैगयो, हथाहथी मनहाथ ॥२७९॥
आंखोंकी शोभारूप भभूत डालकर वह ठग अपने साथ
लगाकर बलसे अति हठकर हाथोंहाथ मेरे मनको वशकर
लेगया आशय यह कि, उसकी शोभासे मेरा मन उसके साथ
गया और रुक न सका जैसे ठग भुकनी डालकर हाथ पकड़
लेजातेहैं । विशेषोक्ति ॥ २७९ ॥
कीन्हे हू कोरिक यतन, अवगाहि काढ़े कौन ।

( ९६ ) सतसई-सटीक ।
भो मनमोहनरूप मिलि,पानीमें को लौन २८०॥
करोडयत्न करकेभी अब पकडकर उसको कौन निका-
ले जलमें नमककी समान मिलकर मेरा मन कृष्णरूप
होगया है। दृष्टान्त ॥ २८० ॥
फिरफिरि चित उतहीरहत, टुटीलाजकी लाव ॥
अँगमें अँग छविझौरमें, भयो भौरकी नाव २८१॥
फिर फिरकरमन उधरही रहता है लाजरूपी रस्सी टूट
गई अंग अंगकी शोभाके समूहमें मन भँवरकी नावसा चक्र
खाताहै आशय यह है कि, जैसे रस्सी टूटनेसे नाव भँवरमें
चक्कर खाती रहती है इसीप्रकार उसके रूपमें मेरा मन
भ्रमता है। रूपक ॥ २८१ ॥
ओठ उचै हाँसी भरी, दृग भौंहनकी चाल ॥
मोमन कहा न पीलियो, पियततमाखू लाल २८२
होठ ऊंचे किये नेत्र और भौंहकी चाल हँसीसे भरी पीछे
उन प्रीतमने तमाखू पान करते मेरा मन पीलिया । स्वभा-
वोक्ति ॥ २८२ ॥
लरिका लेवेके मिसनि, लँगर मोंढिग आय ॥
गयोअचानकआंगुरी,छाती छलछुवाय॥२८३॥

तृतीयशतक ३. (९७)
बालक लेनेके बहाने वह छैल ढीट मेरे निकट आकर
अचानक मेरी छातीमें अपनी अंगुरी छुवाय गया 'पर्यायोक्ति'
नई लगन कुलकी सकुच, विकलभई अकुलाय ।
दुहूँओरऐंचीफिरै, फिर कीलौं दिनजाय ॥२८४॥
नई प्रीति और कुलकी सकुचसे घबराकर व्याकुलहो
दोनों ओर खिचीहुई फिरकीके समान फिरती है, इधर
उधरकी खिचावटमेंही दिन जाता है, कभी प्रीतमका ध्यान
कभी घरका संकोच 'उपमेयलुप्त' परकीयामध्यानायिका २८४
झटकि चढ़ति उतरति अटा, नैकनथाकतिदेह ।
भई रहत नटको बटा, अटकी नागरिनेह॥२८५॥
झट चढ़ती है, और झट अटारीसे उतरती है, देह थकता
नहीं है वह नागरी (चतुर) नेह लगनेके कारण नटका चट्ट
वट्ठाहुई रहती है 'विशेषोक्ति रूपक' ॥ २८५ ॥
इतते उत उतते इतै, क्षण न कहुँ ठहराति ।
कलनपरति चकई भई, फिरि आवति फिरि जाति॥
इधरसे उधर उधरसे इधर फिरती है क्षणभर कहीं नहीं
ठहरती कलनहीं पड़ती चकईके समान प्रीतमके देखनेको
फिर २ आती और जाती है 'उपमेयवाचक लुप्तोपमा' २८६

तृतीय भाग: दोहा ३५१ से ५५० (नीति-विचार, वियोग-वर्णन एवं रूपक)

( ९८ ) सत्सई-सटीक ।
उरउरझो चितचोरसों, गुरुगुरुजनकी लाज ॥
चढ़े हिंडोरेसे हिये, किये बनै गृहकाज ॥२८७॥
मनतौ चित्तचोरसे उलझ रहा है उधर गुरुजनोंकी लज्जा
है हिंडोलेसे हियेपर चढ़करभी बालाको घरका काम कियेही
बनता है आशय यह है कि, डांवाडोल मनसे घरका काम करै
है 'छेकानुप्रास' ॥ २८७ ॥
उनिहरकी हँसिकै उतै, इनसौंपी मुसिक्याय ॥
नैनमिलेमनमिलगयो, दोऊमिलवतगाय॥२८८॥
प्रीतमने हँसकर अपनी गौ प्यारीकी ओर हांकी प्यारीने
हँसकर प्यारेको सौंपी, नैन मिलतेही मन मिलगया, जिस
समय गाय मिलाई द्वितीय असंगति । हरकी-हांकी॥२८८॥
उनको हित उनहीं बनै, कोऊ करो अनेक ।
फिरतकाकगोलकभयो, दुहूँदेह ज्यौंएक ॥२८९॥
दोनोंका हित उन्हीं दोनोंसे बन आता है और कोई
कितनीही करो नहीं बनता दोनोंके शरीरमें एकही जीव कौ
एकी आंखके समान कभी इधर कभी उधर फिरता है
'दृष्टान्त' ॥ २८९ ॥
याके उर औरै कछू, लगी विरहकी लाय ।
पजरैनीर गुलाबके, पियकी बात बुझाय ॥२९०॥

तृतीयशतक ३. ( ९९ )
इसके हियेमें औरही कुछ विरहकी बुरी आग लगी है
गुलाबका जल छिड़कनेसे बलती है और प्रीतमकी बात
करनेसे बुझती है प्रोषितपतिका आग पानीसे बुझती है
परन्तु विरहाग्नि पानीसे बढी. बात-हवासे अग्नि बढती है
यहां बात वार्त्तासे बुझी यह विरुद्धते कार्य हुआ 'विभावना
लंकार' ॥ २९० ॥
तियनियहियजुलगी चलत,पिय नखरेख खरोट।
सूखनदेत न सरसई,खोंटिखोंटिखतखोट २९१॥
चलते हुए प्यारीके हृदयमें जो प्रीतमके नखके खरोंट-
की रेखा लगी है, सो उस क्षतके अंकुरको नखसे कुरेद २
कर उसका गीलापन नहीं सूखने देता यही खोट है. याद
रखनेके निमित्त उपाय है 'अनुज्ञा' ॥ २९१ ॥
बसि सङ्कोचवश रावनवश, साच दिखावति बाल ।
सियलौं शोधतितियतनुहिं,लगनि अगनिकी ज्वाल
प्यारी रावणरूपी लाजके वशमें रहकरभी अपना सत दिखा-
ती है, और शरीरको लगनरूपी अग्निकी लपटमें सीताजीकी
समान शुद्ध करती है अर्थात जैसे रावणके वशमें
आनकर जानकीने अग्निमें अपना शरीर शोधा था, उसी
प्रकार प्यारीभी अब लाज छोड़ संकेतमें आई है, और तुम्हें
सत दिखानेको उत्सुक है इसमें है लाज रूपी रावण, और

( १०० ) सतसई-सटीक ।
रावणके यहां जानकी जैसे रामका ध्यान करतीथीं इसी
प्रकार लाजके वश यहभी तुम्हाराही ध्यान करती है, सो
चलकर देखो 'पूर्णोपमालंकार' ॥ २९२ ॥
नैकु नझुरसी विरह झर, नेहलता कुँभिलाति ।
नित नित होत हरीहरी, खरी झालरति जाति २९३
विरहाग्निकी लपटसे झुलसकै प्रेमकी लता कुछभी नहीं
कुँभलाती, प्रतिदिन हरी भरी हुई बढती जाती है, झालरति
बढती है 'विशेषोक्ति' ॥ २९३ ॥
खल बढई बलकरिथके, कटै न कुवत कुठार ।
आल वाल उरझालरी, खरी प्रेम तरुडार ॥२९४॥
हे सखी दुष्टरूप बढई बलकर हारगये उनके कुवचन
रूपी कुल्हाडेसे नहीं कटता, थांवलेरूपी हृदयमें प्रेमवृक्षकी
डाल बढतीही जाती है 'रूपक विशेषोक्ति' ॥ २९४ ॥
करत जात जेती कठिन, बढिरस सरिता सोत ।
आलवाल उर प्रेमतरु, तितौ तितौ दृढहोत २९५
रसरूपी नदीका सोता बढकर जितनी काट करता जाता
है, थाबलेरूप हृदयमें प्रेमका वृक्ष उतना उतनाहीं दृढ
होता जाता है कटन-किनारेका काटना 'विरोधाभास' २९५॥

तृतीयशतक ३. ( १०१ )
बाल वेलि सूखी सुखद, इहि रूखे रुख घाम ।
फेरि डहडही कीजिये,सुरस सींचि घनश्याम ॥
बेलीके समान वह सुखदायक बाला तुम्हारे रूखे पन-
की धूपसे सूखगई हे हे घनश्याम अब उसे सुरससे सींचकर
हरी कीजिये घाम-धूप। घनश्याम-कृष्ण या मेघ।रस-जल-
और प्रीति। 'परिकरांकुर' ॥ २९६ ॥
देखत ह्वै कपूरलौं, उडैजाय जिनलाल ।
छिन छिन जातपरीखरी, छीन छवीलीवाल २९७
हेलाल वह छवीली क्षणक्षणमें क्षीण पड़ती जातीहै, देखते
देखते न्यून हुई जातीहै, कहीं कपूरके समान उड़नजाय
विरह निवेदन 'पूर्णोपमा वीप्सा' ॥ २९७ ॥
कहा कहौं वाकी दशा, हरि प्राणनके ईश ।
विरहज्वाल जरबो लखै, मरिबोभयोअशीश२९८
हे प्राणेश्वरहरि ! में उसकी दशा क्याकहूँ विरह
अग्निमें जलना हुआ देख उसके लिये मरनाही आशीर्वादहै
'लेशाऽलंकार' ॥ २९८ ॥
हरि हरि वरि वरि करि उठति, करि थकी उपाय।
वाको ज्वर बलि वैद ज्यौं, तोरसजायनोजाय२९९

( १०२ ) सतसई-सटीक ।
हे प्रीतम वियोगमें वह हरिहारि बलि अर्थात् जली २ कह
उठती है,हम उपायकर हारगईं उसकी ताप बली बैदकी भाँ-
ति तुम्हारे रस (प्रेमभरे वाक्य पक्षान्तरमें फुंकीधातु) से जा-
य तो जाय 'वृत्यनुप्रास और श्लेष' ॥ २९९ ॥
यह विनशत नगराखिकै, जगत बडो यशलेहु ।
जरीविषमज्वर जाय यह,आय सुदर्शन देहु ३००
यह स्त्रीरूपी रत्न नाश होताहुआ रखकर जगत्में यशलो
वियोगरूपी विषमज्वरसे जली जाती है, आनकर अपना
सुन्दर दर्शन दीजिये, सुदर्शन चूर्णभी विषमज्वरपर प्रसिद्ध
है, सो दर्शनरूपी चूर्ण माँगती है 'श्लेषालंकार' ॥ ३०० ॥
विहारीकी सतसईमें पण्डित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकासहि-
त तीसरा शतक पूर्ण हुआ ३ शुभमस्तु ।
नैक न जानी परत यों, परो विरह तनु छाम ।
उठति दियालौं बाढि हरि,लिये तुम्हारो नाम ॥
वह कुछ भी जानी नहीं जाती विरहसे शरीर उसका
क्षीण होगया है परन्तु तुम्हारे नाम लेनेसे दियेके समान
चैतन्य हो उठती है । 'उपमालंकार' ॥ ३०१ ॥
मैं ले दयो लयो सुकर, छुवति छनकिगो नीर ।
लाल तिहारो अरगजा,उरलगि भयो अबीर ३०२

चतुर्थशतक ४. (१०३)
मैने जो तुमसे लेकर प्रियाको दिया सो उसने सुन्दर
हाथमें ग्रहणकिया, उसके हाथमें छूतेही पानी जलगया हे
लाल! तुम्हारा दिया अरगजा उसके हृदयमें लगकर अङ्गार
होगया पानी सूखकर श्वेतता होगई विरह वर्णन। "अयुक्ता-
लंकार" ॥ ३०२ ॥
हितकरितुमपठयोलगै, वा विजनाकी बाय ।
टरी तपन तनुकी तऊ, चली पसीना न्हाय ॥ ३०३ ॥
तुमने जो प्रेमकर पंखा भेजा उसकी पवन लगनेसे शरी-
रकी गरमी तो गई परन्तु पसीनेमें न्हागई सात्त्विकभाव प्रगट
होनेसे पसीना आया । 'पंचम विभावना' ॥ ३०३ ॥
हँसि उतार हियते दई, तुम जो तादिन लाल ।
राखत प्राण कपूरलों, वहै गुंजकी माल ॥ ३०४ ॥
आपने जो हँसकर उस दिन हृदयसे उतारकर माला दी
हे हे कृष्ण ! वही घोंटलीकी माला उसके प्राणोंको कपूरकी
भाँति रक्षा करती है कपूरमें घों