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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 137

( ८४ ) सतसई-सटीक ।
एक क्षणको चलती है फिर क्षणमात्रको ठठकती है प्रीत-
मके गलेमें बांहडाले बिजलीकी छटासी वह बाला अटारी
पर चढी घटा देखती है, ‘धर्मलुप्तोपमा’ ॥ २४४ ॥
राधा हरि हरि राधिका, बनिआये संकेत ।
दम्पतिरतिविपरीतसुख, सहजसुरतहूलेत॥२४५॥
राधा कृष्ण बनी और कृष्ण राधा बनकर संकेत (मिला-
पस्थान ) में आये वह दोनों प्रियाप्रीत सहज सुरतमें
ही विपरीत रतिकी सुखलेते हैं, ‘काव्यलिंग.’ इसी शोभाको
मेरे पितृव्य कविवर झब्बीलालने यौं लिखा है कि, पद- यह
जोडी मेरे मनभाई है, गोरेलाल चंद्र सम सोहैं राधेश्याम
अधिकमनमोहैं मानोधटामिलनशशि आईहै ॥१॥ मृदुमुसका
नभरी टौनेकी, भाल बंधी बंदी सोनेकी, सखि दामिनिसी
दमकाई है ॥ २ ॥ शिर मोरन चंद्रिका सुहाई, घटा निरख
बोले मोर आई, जो लालने बंसी बजाई है ॥ ३ ॥ मुक्तमाल
कुचबिच लटकी है । तामें यह शोभा अटकी है । जनु गिरि
बिच नदी बहाई है ॥ ४ ॥ शिर मोतिनकी माँग विराजै ।
ताकी छवि वर्णत कवि लाजै । मनुबक पंक्ति बैठाई है ॥५॥
जबराधे इतउत कहुं डोलैं, नूपुर ऐसी बोली बोलैं । मानो
दादुर झिंगर झरलाई है ॥६॥ बोलत राधे अति प्रिय वानी ।
सों वानी मोहि अति हि सुहानी । मनो कोयल कूक सुनाई