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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 149

( ९६ ) सतसई-सटीक ।
भो मनमोहनरूप मिलि,पानीमें को लौन २८०॥
करोडयत्न करकेभी अब पकडकर उसको कौन निका-
ले जलमें नमककी समान मिलकर मेरा मन कृष्णरूप
होगया है। दृष्टान्त ॥ २८० ॥
फिरफिरि चित उतहीरहत, टुटीलाजकी लाव ॥
अँगमें अँग छविझौरमें, भयो भौरकी नाव २८१॥
फिर फिरकरमन उधरही रहता है लाजरूपी रस्सी टूट
गई अंग अंगकी शोभाके समूहमें मन भँवरकी नावसा चक्र
खाताहै आशय यह है कि, जैसे रस्सी टूटनेसे नाव भँवरमें
चक्कर खाती रहती है इसीप्रकार उसके रूपमें मेरा मन
भ्रमता है। रूपक ॥ २८१ ॥
ओठ उचै हाँसी भरी, दृग भौंहनकी चाल ॥
मोमन कहा न पीलियो, पियततमाखू लाल २८२
होठ ऊंचे किये नेत्र और भौंहकी चाल हँसीसे भरी पीछे
उन प्रीतमने तमाखू पान करते मेरा मन पीलिया । स्वभा-
वोक्ति ॥ २८२ ॥
लरिका लेवेके मिसनि, लँगर मोंढिग आय ॥
गयोअचानकआंगुरी,छाती छलछुवाय॥२८३॥