सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 140

तृतीयशतक ३. (८७)
सकुचकर प्रीतमके पाससे सरक मुसकुराकर प्यारीने
अँगडाई ले हाथसे आँचरकी ओटकर मुख मोर जँभाई ली
आशय यह कि, संभोगकी इच्छा की । 'स्वभावोक्ति'२५१॥
बेंदी भाल तंबोल मुख, सीस सिलसिलेवार ।
दृग आँजे राजै खरी, यही सहज शृँगार ॥ २५२ ॥
माथेपर बेंदी, मुखमें पान, शिरके चिकने बाल, आंखोंमें
काजर दिये इस सहज शृंगारसेही अच्छी शोभा पारही है ।
जाति अलंकार, विक्षिप्तहाव ॥ २५२ ॥
बिब्बोकहाव (प्रियांका विलास)
बिधिविधिकै निकरै टरै, नहीं परेहू पान ।
चितै कितै तैंलैं धरयो, इतौ इते तन मान॥२५३॥
भांति भांतिसे प्रीतमने तेरा मान मनाया, पांवभी पड़े
परन्तु नहीं गया, देख तो इतने छोटे शरीरमें इतना बड़ा
मान तैने कहां रखरा है । अधिक ॥ २५३ ॥
ललित हाववर्णन ।
बतरस लालच लालकी, मुरलीधरी लुकाय ।
सौंहकरै भौंहनि हँस, दैन कहै नटि जाय॥२५४॥
बातोंके रसस्वादके लालची लाल की मुरली प्यारीने