बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(९२) सतसई-सटीक ।
नख सिख रूप भरे खरे, तउ मांगत मुसकान ।
तजत न लोचनलालची, ये ललचौहीं वान॥२६७॥
प्रीतमके नखसे सिखापर्यन्तके रूपमें अत्यन्त भर रहे
हैं, तथापि मुसकुरानदेखनेकी इच्छा करते हैं यह लाल-
ची अपने ललचानेका स्वभाव नहीं छोडते। विशेषोक्ति २६७
यश अपयश देखत नहीं, देखात सांवलगात ।
कहाकरौं लालचभरे, चपल नैन चलिजात॥२६८॥
सखी ! यह यश अपयशको तौ नहीं देखते केवल उनके स-
लौने शरीरको देखतेहैं क्या करूं यह लालचभरे चञ्चल नेत्र
उधरही चलजातेहैं अथवा आधेमें सखीने कहा तूं यश अपयश
नहीं देखती केवल सांवले गात देखती है इसपर आगे उत्तर है।
उत्तरालंकार ॥ २६८ ॥
लाज लगा मनमानहीं, नैनामो वसनाहिं ।
यह मुख जोरतुरंगलों, एचतहू चलिजाहिं २६९
यह नेत्र लज्जारूपी लगामको नहीं मानते, मेरे वशमें
नहीं और मुख जोर घोडेकी समान खैंचनेसेभी उसी ओर
चलेजातेहैं । उपमा और रूपक ॥ २६९ ॥
इनदुखिया अँखियानको, सुखसिरजोईनाहिं ।
देखतबनैन देखते, बिनदेखे अकुलाहिं ॥२७०॥